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किरायेदार ने मकान को नुकसान पहुँचाया तो मुआवज़ा कैसे मिलेगा — जमा राशि से कटौती, सबूत और कानूनी रास्ता 2026

📅 31 October 2026 • ⏱️ 9 मिनट में पढ़ें • ✍️ Rohit Suhan

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चाबी लौटी, और दरवाज़े पर दरार दिख गई

किरायेदार ने चाबी लौटा दी। मालिक ने अंदर जाकर देखा तो एक कमरे की दीवार पर बड़ा दाग़ था, एक खिड़की का शीशा टूटा हुआ था और बाथरूम का एक नल ग़ायब था। मालिक का पहला मन हुआ कि पूरी जमा राशि रोक ली जाए। किरायेदार का जवाब था — इतने साल रहे हैं, इतना तो हो ही जाता है।

दोनों की बात में आधा-आधा सच था, और यहीं झगड़ा शुरू होता है। कानून समय की घिसावट और लापरवाही के नुकसान को एक तराज़ू पर नहीं तौलता — मुआवज़ा उसी नुकसान पर बनता है जो सामान्य रहन-सहन से आगे का हो और बिल व सबूत से साबित हो सके।

इस लेख में उसी फ़र्क को समझेंगे — कौन-सा नुकसान मुआवज़े के लायक है, जमा राशि से कटौती कैसे हो, और बात न बने तो कानूनी रास्ता कौन-सा है।

ℹ️ एक पंक्ति में नियम: किरायेदार को मकान लगभग उसी हालत में लौटाना होता है, जैसी हालत में उसे मिला था — सिर्फ़ सामान्य घिसावट को छोड़कर। सामान्य घिसावट पर कटौती नहीं बनती, असली नुकसान पर बनती है।

पहले यही तय कीजिए — यह घिसावट है या नुकसान

संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 108(एम) में किरायेदार का कर्तव्य लिखा है — वह मकान उसी हालत में लौटाए, जिसमें उसे मिला था, सामान्य घिसावट को छोड़कर। इसी एक पंक्ति से पूरा झगड़ा तय होता है।

सामान्य घिसावट वह बदलाव है जो रहने से अपने आप आता है — पाँच साल बाद दीवार का रंग हल्का पड़ना या फ़र्श पर हल्की खरोंचें। यह किसी की गलती नहीं, समय का असर है, और इस पर कटौती ठीक नहीं मानी जाती।

नुकसान वह है जो लापरवाही, गलत इस्तेमाल या बिना अनुमति बदलाव से हुआ हो — दीवार में बड़ा गड्ढा, टूटी खिड़की, टूटी टाइल, ग़ायब सामान या जानबूझकर तोड़फोड़। इस पर असली मरम्मत ख़र्च माँगा जा सकता है, मनमाना नहीं।

क्या हुआ है किस श्रेणी में आएगा मुआवज़ा बनेगा या नहीं
समय से रंग हल्का पड़ना, हल्की खरोंचें सामान्य घिसावट नहीं
दीवार में बड़ा गड्ढा, टूटी खिड़की या दरवाज़ा असली नुकसान हाँ, असली मरम्मत ख़र्च तक
बिना अनुमति दीवार तोड़ना या ढाँचा बदलना असली नुकसान हाँ, पुरानी हालत में लाने का ख़र्च
पहले से टूटी चीज़ का दोष किरायेदार पर डालना न पहले का, न किरायेदार का नहीं, जब तक पहले की हालत साबित न हो
बकाया किराया या बिजली-पानी का बकाया बिल अलग बकाया, नुकसान नहीं हाँ, पर नुकसान के ख़र्च से अलग हिसाब से

एक बात और साफ़ रखिए — पुरानी चीज़ की मरम्मत पर नई चीज़ की कीमत नहीं माँगी जा सकती। मुआवज़ा पुरानी हालत में लाने तक सीमित रहता है, मकान नया बनाने तक नहीं।

सबसे बड़ी ग़लती पहले दिन होती है — जब कोई सूची नहीं बनती

ज़्यादातर झगड़े खाली करते समय नहीं, आते समय हार जाते हैं — तब किसी ने यह लिखा ही नहीं कि मकान किस हालत में दिया गया था। फिर जाते समय हर दाग़ पर बहस होती है कि यह पहले से था या बाद में हुआ।

समझदारी यह है कि किराया नामा बनते समय मकान की हालत की छोटी सूची भी बन जाए — पहले से दाग़, ढीला नल, चटकी खिड़की, दिया गया सामान — दोनों पक्ष हस्ताक्षर करें और हर कमरे की तारीख़ वाली फ़ोटो रख लें। खाली करते समय उसी सूची से जाँच दोहराइए और कमी उसी समय लिख लीजिए।

⚠️ आम ग़लती: खाली होने के हफ़्तों बाद सूची बनाना — तब यह साबित करना मुश्किल हो जाता है कि नुकसान उसी किरायेदार के समय का है। जाँच खाली होने के दिन ही कीजिए।

मालिक का दावा कब मज़बूत बनता है — तीन शर्तें

पहली शर्त — किराया नामा में बात साफ़ हो। नामे में लिखा हो कि किरायेदार मकान की देखभाल करेगा, बिना अनुमति ढाँचा नहीं बदलेगा और जाते समय मकान उसी हालत में लौटाएगा। बिना नामे के दावा कमज़ोर पड़ जाता है, हालाँकि खत्म नहीं होता।

दूसरी शर्त — नुकसान किरायेदार के समय का साबित हो। आते समय और जाते समय की फ़ोटो व सूची का मिलान ही यह साबित करता है कि नुकसान बीच के समय में हुआ। सिर्फ़ यह कहना कि मकान पहले अच्छा था, सबूत नहीं बनता।

तीसरी शर्त — ख़र्च असली और हिसाब के साथ हो। मरम्मत का बिल, मिस्त्री की रसीद, सामान की खरीद का प्रमाण — यही ख़र्च को असली बनाते हैं। बिना बिल की एकमुश्त बड़ी रकम अक्सर विवाद में बदल जाती है।

मॉडल किरायेदारी अधिनियम, 2021 में भी यही ढाँचा है — मालिक ढाँचागत मरम्मत कराए, किरायेदार रोज़मर्रा की देखभाल करे। पर मॉडल कानून अपने आप पूरे देश में लागू नहीं होता, हर राज्य अपना कानून बनाता है — इसलिए अपने राज्य का कानून और नामे की शर्तें पहले देखिए। मॉडल किरायेदारी अधिनियम 2021 के नए नियम में यह बँटवारा विस्तार से समझाया गया है।

जमा राशि से कटौती का सही तरीका

जमा राशि किरायेदार का पैसा है, जो मालिक के पास सुरक्षा के रूप में रहता है — मालिक की कमाई नहीं। इसलिए कटौती सिर्फ़ असली नुकसान, बकाया किराया और बकाया बिलों तक रखिए, सामान्य घिसावट या मकान नया बनाने का ख़र्च इसमें मत जोड़िए। हर कटौती का अलग-अलग हिसाब बिल के साथ लिखकर दीजिए, और बची राशि बिना देर किए लौटाइए।

किरायेदार के लिए भी एक समझदारी है — जाते समय छोटी मरम्मत खुद करवा देना कई बार मालिक के बड़े बिल से सस्ता पड़ता है, पर मरम्मत से पहले मालिक को लिखित में बता देना अच्छा रहता है।

✓ सीधा नियम: कटौती का हिसाब ऐसा होना चाहिए कि कोई तीसरा व्यक्ति भी उसे पढ़कर समझ जाए — क्या टूटा, कब टूटा, मरम्मत पर कितना लगा, और बिल कहाँ है। जिस कटौती का हिसाब नहीं, वह कटौती टिकती नहीं।

नुकसान जमा राशि से ज़्यादा हो तो क्या होगा

कई बार नुकसान इतना बड़ा होता है कि जमा राशि कम पड़ जाती है — जैसे बिना अनुमति दीवार तोड़ दी गई हो। ऐसे में मालिक का अधिकार जमा राशि तक खत्म नहीं होता, वह बाकी रकम की माँग अलग से कर सकता है। पहले नुकसान की सूची, फ़ोटो और बिल के साथ लिखित माँग भेजिए। बात न बने तो वकील के माध्यम से माँग भेजिए, फिर राज्य के किराया कानून के अनुसार किराया प्राधिकरण या दीवानी अदालत का रास्ता देखिए।

ध्यान रखिए — भरपाई के लिए मालिक किरायेदार का सामान रोक नहीं सकता, बिजली-पानी बंद नहीं कर सकता और ताला नहीं बदल सकता। ये तरीके मालिक का अपना पक्ष कमज़ोर करते हैं। मुआवज़ा काग़ज़ और मंच से माँगा जाता है, दबाव से नहीं।

किरायेदार का पक्ष भी सुनिए — हर कटौती सही नहीं होती

किरायेदार के पास भी मज़बूत बचाव हो सकते हैं। पहला — नुकसान पहले से था, और आते समय की सूची या फ़ोटो में दिख रहा है। दूसरा — नुकसान सामान्य घिसावट है, जैसे लंबे समय बाद रंग फीका पड़ना। तीसरा — मालिक ने समय पर मरम्मत नहीं करवाई, हालाँकि किरायेदार ने टपकती छत या खराब पाइप की शिकायत लिखित में की थी। चौथा — बिल मनमाना है, बिना हिसाब की कटौती को चुनौती दी जा सकती है।

किरायेदार के लिए सबसे काम की सलाह यही है — आते समय की फ़ोटो सँभालकर रखें, शिकायतें हमेशा लिखित में करें, और जाते समय अपनी ओर से भी फ़ोटो लेकर मालिक के सामने जाँच करवाएँ।

मुआवज़ा माँगने के कदम — क्रम से चलिए

पहला कदम — उसी दिन जाँच और सूची। खाली होने के दिन जाँच कीजिए, सूची बनाइए, तारीख़ वाली फ़ोटो लीजिए और किरायेदार के हस्ताक्षर लेने की कोशिश कीजिए।

दूसरा कदम — मरम्मत का असली हिसाब। दो जगह से भाव लीजिए, मरम्मत करवाइए और हर बिल सँभालकर रखिए — पुरानी हालत में लाने तक ही रहिए।

तीसरा कदम — लिखित हिसाब और माँग। किरायेदार को लिखित में भेजिए — क्या टूटा, बिल कितना है, जमा राशि से कितना काटा गया, बची राशि कितनी है। लिखित बातचीत बाद में सबसे बड़ा सबूत बनती है।

चौथा कदम — बात न बने तो मंच। वकील से सलाह लेकर राज्य के किराया कानून के अनुसार किराया प्राधिकरण या दीवानी अदालत का रास्ता देखिए। हर राज्य का ढाँचा एक जैसा नहीं है, इसलिए मंच चुनने से पहले लागू कानून की पुष्टि कर लीजिए।

जाँच सूची — खाली करते समय इसे साथ रखिए

✓ आते समय की सूची और फ़ोटो सामने रखकर हर कमरे की जाँच की गई।
✓ हर नुकसान की तारीख़ वाली फ़ोटो ली गई।
✓ नुकसान सामान्य घिसावट है या असली नुकसान, यह अलग-अलग लिखा गया।
✓ मरम्मत के बिल और रसीदें सँभालकर रखी गईं।
✓ जमा राशि की कटौती का अलग-अलग हिसाब लिखित में दिया गया।
✓ बची हुई राशि लौटाने की तारीख़ और तरीका लिखित में तय हुआ।
✓ बिजली, पानी और रखरखाव के बकाया बिलों का हिसाब अलग से किया गया।
✓ हर अहम बात लिखित में है, सिर्फ़ ज़ुबानी नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1 — किरायेदार ने दीवार पर कीलें ठोंकी हैं, क्या यह नुकसान है?
छोटी कीलों के निशान आमतौर पर सामान्य रहन-सहन में गिने जाते हैं, पर बड़े छेद या बिना अनुमति ड्रिल नुकसान माने जा सकते हैं।

प्रश्न 2 — पूरे मकान की पुताई का ख़र्च किरायेदार से माँगा जा सकता है?
सिर्फ़ तभी, जब किरायेदार की वजह से दीवारें इस हद तक खराब हुई हों कि पुताई ज़रूरी हो जाए। समय से फीका पड़ा रंग सामान्य घिसावट है।

प्रश्न 3 — किरायेदार बिना बताए चला गया और नुकसान छोड़ गया, तो क्या करें?
जल्दी जाँच कीजिए, फ़ोटो और सूची बनाइए, लिखित में हिसाब भेजिए और बकाया किराया व नुकसान की माँग कीजिए। संपर्क न हो तो भी लिखित माँग का रिकॉर्ड रखिए।

प्रश्न 4 — नुकसान पहले से था, पर मालिक अब किरायेदार पर डाल रहा है, तो किरायेदार क्या करे?
आते समय की फ़ोटो और सूची दिखाकर लिखित में विरोध दर्ज कीजिए — बिना सबूत की कटौती को चुनौती दी जा सकती है।

प्रश्न 5 — मालिक ने बिना बिल के पूरी जमा राशि रोक ली है, तो रास्ता क्या है?
पहले लिखित में हिसाब माँगिए, फिर वकील के माध्यम से माँग भेजिए। बात न बने तो राज्य के किराया कानून के अनुसार किराया प्राधिकरण या दीवानी अदालत में दावा किया जा सकता है।

आखिरी बात — मुआवज़ा सबूत से मिलता है, झगड़े से नहीं

तीन बातें याद रखिए — आते समय की सूची ही जाते समय का सबसे बड़ा सबूत है, कटौती का हिसाब बिल के साथ होना चाहिए, और दबाव के तरीके मालिक का पक्ष कमज़ोर करते हैं।

नोट: यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है, किसी व्यक्ति विशेष के लिए कानूनी सलाह नहीं है। बड़ा फैसला लेने, समझौता करने, लिखित माँग भेजने या मुक़दमा दायर करने से पहले किसी अनुभवी वकील से सलाह ज़रूर लीजिए। नियम और अधिसूचना समय-समय पर बदल सकती है, इसलिए कार्रवाई से पहले अपने राज्य के वर्तमान नियम की पुष्टि कर लीजिए।

Rohit Suhan
आसान भाषा में कानूनी जानकारी — हर भारतीय के लिए।

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