पहले यह तय कर लीजिए कि यह लेख आपके लिए है भी या नहीं। अगर आपके पास अपना मकान है, आपने कभी किसी को किराये पर मकान दिया नहीं और खुद भी कभी किराये पर रहे नहीं, तो यह लेख आपके किसी काम का नहीं है। आप इसे छोड़ सकते हैं।
लेकिन अगर आप किराये के मकान में रहते हैं, अपना मकान-दुकान किराये पर दे रखा है, या जल्द नया समझौता करने वाले हैं, तो आगे की हर पंक्ति आपके काम की है। किराये के झगड़ों में सबसे ज़्यादा नुकसान उसी को होता है जिसे नियम ही नहीं पता होता।
पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर यह बात खूब घूम रही है कि “नया किराया कानून आ गया है, अब सुरक्षा राशि दो महीने से ज़्यादा नहीं ली जा सकती।” यह बात आधी सही है — ऐसा नियम सच में एक आदर्श अधिनियम में लिखा है — और आधी गलत है, क्योंकि वह आदर्श अधिनियम अपने आप पूरे देश में लागू नहीं होता।
सबसे बड़ा भ्रम — यह केंद्रीय कानून नहीं, आदर्श ढाँचा है
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2 जून 2021 को मॉडल किरायेदारी अधिनियम को मंज़ूरी दी, और 7 जून 2021 को इसे राज्यों को भेजा गया, ताकि वे इसे नया कानून बनाकर या पुराने किराया कानून में बदलाव करके अपना सकें।
यहीं से भ्रम शुरू होता है। किराया राज्य का विषय है, इसलिए केंद्र राज्यों के लिए सीधे किराया कानून नहीं बना सकता। इसीलिए केंद्र ने एक आदर्श ढाँचा तैयार किया है — एक नमूना, जिसे राज्य चाहें तो अपना लें, बदल लें, या अभी टाल भी दें।
इसका सीधा अर्थ यह है कि मॉडल अधिनियम की कोई भी बात तब तक आप पर लागू नहीं होती, जब तक आपके राज्य ने उसे अपने कानून में शामिल न कर लिया हो।
हरियाणा में आज की स्थिति — जल्दबाज़ी में निष्कर्ष मत निकालिए
हरियाणा के पाठकों के लिए यह सवाल सबसे ज़रूरी है, और इसका ईमानदार जवाब यह है कि हरियाणा में मॉडल अधिनियम के पूरे ढाँचे के लागू होने की पक्की पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। कुछ राज्यों ने इसे अपना लिया है, कई में मसौदे और संशोधन की प्रक्रिया चल रही है।
इसलिए हरियाणा में किराये पर रहने या देने वाले व्यक्ति के लिए आज भी सबसे मज़बूत आधार उसका लिखित किराया समझौता है। समझौते में जो बातें साफ़ लिखी हैं, विवाद होने पर वही सबसे पहले देखी जाती हैं। मॉडल अधिनियम की बातें तब काम आएँगी जब राज्य उसे अपना लेगा, या जब आप नया समझौता करते समय उन्हीं बातों को अपने समझौते में लिखवा लेंगे।
मॉडल अधिनियम के 7 बड़े बदलाव — एक नज़र में
मॉडल अधिनियम का मकसद दोनों पक्षों के हितों में संतुलन बनाना है — न सिर्फ़ किराएदार का पक्ष, न सिर्फ़ मकान मालिक का।
| बदलाव | मॉडल अधिनियम में क्या है |
|---|---|
| लिखित समझौता अनिवार्य | बिना लिखित समझौते के किराया नहीं — मौखिक बात पर कोई सुरक्षा नहीं |
| किराया प्राधिकरण को सूचना | समझौते के दो महीने के भीतर प्राधिकरण को जानकारी देनी होगी |
| सुरक्षा राशि की सीमा | रिहायशी मकान के लिए ज़्यादा से ज़्यादा दो महीने का किराया |
| दुकान-दफ्तर की सुरक्षा राशि | गैर-रिहायशी जगह के लिए ज़्यादा से ज़्यादा छह महीने का किराया |
| बेदखली का तय रास्ता | मालिक सीधे ताला नहीं बदल सकता — प्राधिकरण के ज़रिये ही बेदखली होगी |
| तीन स्तर का विवाद निपटारा | किराया प्राधिकरण, फिर किराया न्यायालय, फिर किराया अधिकरण |
| मरम्मत की बँटी ज़िम्मेदारी | बड़ी मरम्मत मालिक की, छोटी-रोज़मर्रा की मरम्मत किराएदार की |
लिखित समझौता और किराया प्राधिकरण — काग़ज़ ही आपकी ढाल है
मॉडल अधिनियम के अनुसार कोई भी जगह किराये पर सिर्फ़ लिखित समझौते से ही दी जा सकेगी। समझौते में किराये की रकम, किराये की अवधि, किराया बढ़ाने की शर्त, पहले से दी जाने वाली सुरक्षा राशि, मकान में मालिक के आने के उचित कारण और दोनों की ज़िम्मेदारियाँ लिखी होनी चाहिए।
समझौते के दो महीने के भीतर दोनों पक्षों को मिलकर किराया प्राधिकरण को इसकी जानकारी देनी होगी। प्राधिकरण सात कामकाजी दिनों के भीतर एक खास पहचान संख्या देगा और ब्योरा अपनी वेबसाइट पर डालेगा। बिना सूचना वाले समझौते पर मॉडल अधिनियम के तहत राहत माँगना मुश्किल हो जाता है।
यहीं पर पुरानी आदत सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाती है। आज भी बहुत से लोग “जान-पहचान के हैं, काग़ज़ की क्या ज़रूरत” कहकर मौखिक समझौते पर मकान ले लेते हैं। किराया बढ़ने या सुरक्षा राशि लौटाने पर जब बात बिगड़ती है, तो उनके पास दिखाने को कुछ नहीं होता।
सुरक्षा राशि की सीमा — किराएदार को सबसे बड़ा फायदा, मालिक को भी साफ़ नियम
आज की हकीकत यह है कि कई शहरों में मकान मालिक छह से दस महीने तक का किराया सुरक्षा राशि के नाम पर पहले ही ले लेते हैं। खाली करते समय वही राशि लौटाने में महीनों लग जाते हैं, और कटौती को लेकर झगड़ा अलग होता है।
मॉडल अधिनियम इस पर सीधी सीमा लगाता है — रिहायशी मकान के लिए दो महीने के किराये से ज़्यादा नहीं, और दुकान-दफ्तर के लिए छह महीने से ज़्यादा नहीं। खाली कब्ज़ा मिलने पर बकाया कटौती के बाद बची राशि लौटानी होगी।
| महीने का किराया | रिहायशी मकान — ज़्यादा से ज़्यादा सुरक्षा राशि | दुकान-दफ्तर — ज़्यादा से ज़्यादा सुरक्षा राशि |
|---|---|---|
| 8,000 रुपये | 16,000 रुपये | 48,000 रुपये |
| 15,000 रुपये | 30,000 रुपये | 90,000 रुपये |
| 25,000 रुपये | 50,000 रुपये | 1,50,000 रुपये |
एक सावधानी यहाँ भी ज़रूरी है। यह सीमा मॉडल अधिनियम की है, न कि हर शहर में आज लागू नियम की। अगर आपका राज्य इसे अपना चुका है, तो यह सीमा आपके काम की है। अगर नहीं अपनाया है, तो भी नया समझौता करते समय आप इस सीमा को बातचीत का आधार बना सकते हैं।
किराया कब बढ़ेगा — समझौते में लिखा होगा, तभी बढ़ेगा
किराया बढ़ोतरी के झगड़े इसीलिए होते हैं, क्योंकि समझौते में इस बारे में कुछ लिखा ही नहीं होता। मॉडल अधिनियम के अनुसार रकम और बढ़ाने की शर्त आपसी सहमति से तय होगी और समझौते में लिखी होगी।
अगर समझौते में बढ़ोतरी की शर्त नहीं लिखी है, तो मॉडल अधिनियम के अनुसार मालिक बढ़ा हुआ किराया लागू होने से तीन महीने पहले सूचना दे सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मालिक जब चाहे, जितना चाहे बढ़ा दे।
व्यावहारिक सलाह यह है कि समझौता करते समय ही यह पंक्ति ज़रूर लिखवाइए — “किराया हर साल कितने प्रतिशत बढ़ेगा, किस तारीख़ से बढ़ेगा, और सूचना कितने दिन पहले दी जाएगी।” यह एक पंक्ति आगे चलकर सबसे बड़े झगड़े को रोक देती है।
मकान खाली न किया तो दोगुना, फिर चौगुना किराया
मकान मालिकों की सबसे बड़ी चिंता यही होती है कि अवधि खत्म होने के बाद भी किराएदार मकान खाली न करे और मुकदमा सालों चलता रहे। मॉडल अधिनियम इस डर का जवाब बढ़े हुए किराये से देता है।
अगर किराये की अवधि खत्म हो गई है और उसे बढ़ाया नहीं गया है, या किराएदार अवधि खत्म होने के बाद भी मकान खाली नहीं करता है, तो उसे पहले दो महीने तक दोगुना किराया और उसके बाद जब तक वह मकान में रहेगा, चौगुना किराया देना होगा। यह नियम तभी लागू नहीं होता जब मकान वाली जगह किसी प्राकृतिक आपदा से प्रभावित हो।
कौन क्या ठीक कराएगा — झगड़े की जड़ यहीं है
नल टपकना, पेंट उतरना, फिटिंग खराब होना — ये छोटी बातें ही किराया विवादों की सबसे बड़ी जड़ होती हैं। मॉडल अधिनियम ज़िम्मेदारी साफ़ बाँटता है, बशर्ते समझौते में कुछ और न लिखा हो:
| काम | किसकी ज़िम्मेदारी |
|---|---|
| ढाँचे की मरम्मत, दीवारों की पुताई, दरवाज़े-खिड़कियों का पेंट | मकान मालिक |
| पानी-बिजली की पाइप और तारों की ज़रूरी मरम्मत | मकान मालिक |
| नाली की सफाई, स्विच-सॉकेट की मरम्मत, रसोई की फिटिंग | किराएदार |
| खिड़की-दरवाज़े के टूटे शीशे बदलना, बगीचे और खुली जगह की देखरेख | किराएदार |
| किराएदार की लापरवाही या जानबूझकर किया गया नुकसान | किराएदार |
बेदखली — मालिक की भी सीमा है, किराएदार की भी
मॉडल अधिनियम के अनुसार किराएदार को बेदखल करने के लिए मालिक को किराया प्राधिकरण के पास जाना होगा। बेदखली के कारण तय हैं — तय किराया देने से इनकार, दो महीने से ज़्यादा समय तक किराया न देना, बिना लिखित सहमति के मकान किसी और को सौंप देना, चेतावनी के बाद भी मकान का गलत इस्तेमाल जारी रखना, या बिना सहमति के ढाँचे में बदलाव करना।
इसका अर्थ यह नहीं है कि किराएदार कभी नहीं निकाला जा सकता — रास्ता तय है। न मालिक ताला बदलकर सामान बाहर फेंक सकता है, न बिजली-पानी बंद करके दबाव बना सकता है, और न किराएदार अवधि खत्म होने के बाद बिना किराया दिये मकान पर कब्ज़ा जमाए रख सकता है।
विवाद हो तो कहाँ जाएँ — तीन सीढ़ियों का रास्ता
1 किराया प्राधिकरण। सबसे पहले शिकायत यहीं जाती है। समझौते की सूचना, सुरक्षा राशि, ज़रूरी सेवाओं की बहाली और बेदखली जैसे मामले यहीं से शुरू होते हैं।
2 किराया न्यायालय। प्राधिकरण के फैसले से असंतुष्ट पक्ष इसके आगे किराया न्यायालय में जा सकता है।
3 किराया अधिकरण। यह सबसे ऊपरी स्तर है। मॉडल अधिनियम का मकसद है कि किराया न्यायालय और अधिकरण शिकायतों का निपटारा 60 दिनों के भीतर करें, ताकि किराया विवाद सालों न लटके।
नया समझौता करते समय लिखवाने वाली 8 बातें — जाँच-सूची
✓ किराये की रकम, भुगतान की तारीख़ और भुगतान का तरीका साफ़ लिखा हो
✓ किराये की अवधि और अवधि खत्म होने पर बढ़ाने की प्रक्रिया लिखी हो
✓ किराया बढ़ोतरी का प्रतिशत, तारीख़ और सूचना की अवधि लिखी हो
✓ सुरक्षा राशि की रकम और खाली करते समय लौटाने की शर्त लिखी हो
✓ मरम्मत की ज़िम्मेदारी — बड़ी और छोटी — अलग-अलग लिखी हो
✓ मकान में मालिक के आने के उचित कारण और सूचना की अवधि लिखी हो
✓ मकान किसी और को देने, ढाँचे में बदलाव और पालतू जानवर जैसे विषयों पर स्थिति साफ़ हो
✓ समझौते की दोनों प्रतियों पर हस्ताक्षर हों और एक प्रति आपके पास सुरक्षित रखी हो
भ्रम बनाम सच — मॉडल अधिनियम के बारे में फैली बातें
| भ्रम | सच |
|---|---|
| मॉडल किरायेदारी अधिनियम पूरे देश में लागू हो गया है। | यह आदर्श ढाँचा है — लागू तभी होगा जब आपका राज्य इसे अपनाएगा। |
| हर शहर में सुरक्षा राशि अब दो महीने से ज़्यादा नहीं ली जा सकती। | यह सीमा मॉडल अधिनियम की है — अपने राज्य में अपनाए जाने की पुष्टि पहले कीजिए। |
| मालिक जब चाहे किराया बढ़ा सकता है। | बढ़ोतरी समझौते की शर्त और सूचना के नियम से बँधी है। |
| मालिक बिजली-पानी बंद करके मकान खाली करा सकता है। | ज़रूरी सेवाएँ रोकना मॉडल ढाँचे के खिलाफ है — प्राधिकरण सेवा बहाल करा सकता है। |
| किराएदार अवधि खत्म होने के बाद भी बिना अतिरिक्त किराये के रह सकता है। | अवधि खत्म होने के बाद पहले दो महीने दोगुना, फिर चौगुना किराया देना होगा। |
| मौखिक समझौता भी काफी है, जान-पहचान के लोग हैं। | बिना लिखित समझौते के विवाद में आपका पक्ष कमज़ोर रहता है — काग़ज़ ही सुरक्षा है। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या मॉडल किरायेदारी अधिनियम 2021 अभी मेरे शहर में लागू है?
यह आपके राज्य पर निर्भर करता है। केंद्र ने इसे आदर्श ढाँचे के रूप में राज्यों को भेजा था — लागू होने की पुष्टि अपने राज्य की सूचना से कीजिए।
प्रश्न 2: रिहायशी मकान के लिए सुरक्षा राशि की ज़्यादा से ज़्यादा सीमा क्या है?
मॉडल अधिनियम के अनुसार दो महीने का किराया; दुकान-दफ्तर के लिए छह महीने तक। खाली कब्ज़ा मिलने पर बकाया कटौती के बाद बची राशि लौटानी होगी।
प्रश्न 3: किराया विवाद में सबसे पहले कहाँ शिकायत करें?
मॉडल ढाँचे के अनुसार सबसे पहले किराया प्राधिकरण के पास, फिर किराया न्यायालय और किराया अधिकरण। समझौते की प्रति और भुगतान का रिकॉर्ड तैयार रखिए।
प्रश्न 4: मेरा राज्य मॉडल अधिनियम अपना चुका है या नहीं, यह कैसे पता चलेगा?
अपने राज्य के आवास या राजस्व विभाग की वेबसाइट पर हाल की अधिसूचना देखिए। सोशल मीडिया की पोस्ट को अधिसूचना मत समझिए।
प्रश्न 5: पुराना समझौता मौखिक है — अब क्या करूँ?
जल्दी से जल्दी उसे लिखित रूप में बदलवाइए — दोनों पक्ष शर्तें लिख लें, हस्ताक्षर करें और एक-एक प्रति रख लें।
अंत में एक सीधी बात — मॉडल अधिनियम अपने आप आपकी रक्षा नहीं करेगा। आपकी रक्षा करेगा आपका लिखित समझौता, भुगतान का रिकॉर्ड और समय पर की गई लिखित माँग।
नोट: यह लेख सामान्य क़ानूनी जानकारी के लिए है, किसी व्यक्ति विशेष के लिए क़ानूनी सलाह नहीं है। कोई बड़ा फ़ैसला लेने से पहले अनुभवी वकील से सलाह ज़रूर लीजिए और अपने राज्य की ताज़ा अधिसूचना से तथ्य की पुष्टि कर लीजिए।