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वेतन देर से मिले या कट जाए तो क्या करें — मज़दूरी भुगतान कानून के अधिकार 2026

📅 2 November 2026 • ⏱️ 9 मिनट में पढ़ें • ✍️ Rohit Suhan

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महीना खत्म, वेतन नहीं — और ऊपर से कटी हुई रकम

एक कारखाने में काम करने वाले मज़दूर का महीना पहली तारीख को खत्म हो गया। पंद्रह तारीख आ गई, वेतन का कोई पता नहीं। ठेकेदार से पूछा, तो जवाब मिला — इस महीने काम कम हुआ है, इसलिए कुछ रकम काट ली गई है, और बाकी अगले महीने के साथ मिल जाएगा। मज़दूर चुप हो गया। उसे लगा, सवाल उठाया तो अगले महीने का काम भी हाथ से निकल जाएगा।

यहीं सबसे बड़ी भूल हो जाती है। वेतन का देर से मिलना और वेतन में से रकम काट लेना — ये दोनों बातें मालिक या ठेकेदार की मर्ज़ी पर नहीं छोड़ी गई हैं। इनके लिए कानून में साफ समय-सीमा और सीमा तय है। जो ये नियम जानता है, वह न डरकर चुप रहता है, न बिना सबूत झगड़ा करता है — वह लिखित में अपना हक़ माँगता है।

इस लेख में उसी हक़ को समझेंगे — वेतन कब तक मिलना चाहिए, कौन-सी कटौती सही है, पर्ची क्यों ज़रूरी है, और बात न बने तो शिकायत कहाँ करें।

पहले दो बातें अलग कीजिए — देरी और कटौती एक मामला नहीं

लोग अक्सर दोनों को एक ही शिकायत समझ लेते हैं, और यहीं से पक्ष कमज़ोर पड़ जाता है। देरी का सवाल यह है कि वेतन तय समय पर मिला या नहीं। कटौती का सवाल यह है कि मिली रकम में से क्या काटा गया और क्या वह काटना कानून में लिखा है। दोनों के नियम अलग हैं, इसलिए शिकायत में भी दोनों को अलग-अलग लिखना चाहिए।

वेतन दस दिन देर से मिला, पर पूरा मिला — तो मामला देरी का है। वेतन समय पर मिला, पर बिना लिखित कारण के रकम काट ली गई — तो मामला गलत कटौती का है। दोनों एक साथ हों, तो शिकायत में दोनों बातें अलग-अलग बिंदुओं में लिखिए।

ℹ️ एक पंक्ति में बात: वेतन का समय पर और पूरा मिलना दो अलग अधिकार हैं — देरी पर समय-सीमा का नियम लागू होता है, कटौती पर सिर्फ कानून में लिखी कटौती की इजाज़त है।

वेतन कब तक मिलना चाहिए — तारीख का पक्का नियम

मज़दूरी भुगतान अधिनियम, 1936 में वेतन देने की समय-सीमा साफ लिखी है, और यही नियम मज़दूरी भुगतान संहिता, 2019 में भी आगे बढ़ाए गए हैं। वेतन अवधि एक महीने से ज़्यादा नहीं हो सकती।

किसकी स्थिति हैवेतन कब तक मिलना चाहिए
एक हज़ार से कम कामगारअवधि खत्म होने के बाद सातवें दिन से पहले
एक हज़ार या ज़्यादा कामगारअवधि खत्म होने के बाद दसवें दिन से पहले
नौकरी खत्म हो गई होसमाप्ति के दिन से दूसरे कामकाजी दिन से पहले बकाया वेतन
दिन या हफ्ते के हिसाब से कामतय अवधि खत्म होते ही भुगतान की बारी — अगले महीने तक नहीं टाला जा सकता

“अगले महीने के साथ दे देंगे” — यह कोई कानूनी जवाब नहीं है। वेतन अवधि खत्म होते ही उसकी अपनी समय-सीमा शुरू हो जाती है। मालिक की दिक्कत या काम कम होना वेतन रोकने का बहाना नहीं बन सकता। हाँ, वेतन अवधि अलग तय हो — जैसे पखवाड़े के हिसाब से भुगतान — तो समय-सीमा उसी अवधि से गिनी जाएगी। इसलिए पहले अपनी तय वेतन अवधि पता कीजिए, फिर देरी गिनिए।

वेतन नकद, चेक या बैंक खाते में दिया जा सकता है। तरीका चाहे जो हो, भुगतान का सबूत रहना चाहिए — बैंक में आई रकम, रसीद या वेतन पर्ची। नकद लेने वाले बिना पर्ची के रकम न लें, वरना बाद में यह साबित करना मुश्किल होगा कि कितना मिला और कितना बाकी है।

कौन-सी कटौती सही है, कौन-सी गलत

कटौती का नियम और भी सख्त है। कानून में सिर्फ कुछ ही तरह की कटौतियाँ लिखी हैं। जो कटौती उस सूची में नहीं है, वह अपने आप गलत मानी जाएगी, चाहे मालिक उसे किसी भी नाम से पुकारे।

सही मानी जा सकने वाली कटौतीआम तौर पर गलत कटौती
भविष्य निधि, कर्मचारी राज्य बीमा जैसी तय कटौतियाँ“काम धीमा था” या “ऑर्डर कम आया” कहकर बिना लिखित कारण की कटौती
आयकर जैसी कानून के आदेश से कटौतीबिना बताए, बिना पर्ची के कोई भी कटौती
लिखित सहमति से लिया गया अग्रिम या ऋण की किस्तबिना सुनवाई के लगाया गया भारी जुर्माना
अनुपस्थिति के दिनों का वेतन — सिर्फ उतने दिन काछुट्टी या बीमारी के दिन को बिना नियम “अनुपस्थिति” बताकर काटना
लापरवाही से हुए नुकसान की भरपाई — कारण बताकर सुनवाई के बादपूरे महीने का वेतन “सज़ा” के नाम पर रोक लेना

दो संख्याएँ याद रखिए। पहली — कुल कटौती आम तौर पर वेतन के पचास प्रतिशत से ज़्यादा नहीं हो सकती; सिर्फ सहकारी समिति को भुगतान के मामले में यह सीमा पचहत्तर प्रतिशत तक जाती है। दूसरी — एक वेतन अवधि में जुर्माना देय वेतन के तीन प्रतिशत से ज़्यादा नहीं हो सकता, और पंद्रह साल से कम उम्र के व्यक्ति पर जुर्माना लगाया ही नहीं जा सकता।

⚠️ ध्यान रखिए: जुर्माना लगाने से पहले मज़दूर को कारण बताना और अपनी बात कहने का मौका देना ज़रूरी है। बिना कारण बताए काटी गई रकम पर सवाल उठाना आपका अधिकार है, बदतमीज़ी नहीं।

अनुपस्थिति की कटौती में भी गड़बड़ आम है। आधे दिन न आने पर सिर्फ आधे दिन का वेतन कट सकता है, पूरे दिन का नहीं। दस या ज़्यादा व्यक्ति बिना कारण और बिना सूचना के एक साथ अनुपस्थित रहे हों, तभी सूचना के बदले आठ दिन तक की कटौती का नियम लागू हो सकता है — अकेले मज़दूर पर यह नियम अपने आप नहीं लगता। हाज़िरी रिकॉर्ड माँगकर मिलान कीजिए, कई बार हिसाब वहीं गलत निकलता है।

वेतन पर्ची — छोटा काग़ज़, बड़ा सबूत

वेतन पर्ची को लोग अक्सर फेंक देते हैं, और यही सबसे महँगी भूल साबित होती है। पर्ची में लिखा होता है — कुल वेतन कितना बना, किस मद में कितनी कटौती हुई, और हाथ में कितना आया। बिना पर्ची के यह साबित करना ही मुश्किल होगा कि कटौती हुई थी, और कितनी हुई थी।

हर महीने वेतन पर्ची माँगिए और सँभालकर रखिए। न मिले तो लिखित में माँगिए — एक छोटा पत्र भी काफी है। पत्र की प्रति अपने पास रखिए। नकद लेने वाले पर्ची पर हस्ताक्षर से पहले रकम गिन लें, और पर्ची की प्रति या फ़ोटो ज़रूर रखें।

ठेके से काम करने वालों के लिए यह और भी ज़रूरी है — ठेकेदार और मालिक एक-दूसरे पर टाल सकते हैं। काग़ज़ ही बताएगा कि वेतन किसके माध्यम से आना था। नियुक्ति, ठेका, पहचान पत्र और हाज़िरी रिकॉर्ड एक फाइल में रखिए।

पहले सात दिन में यही काम कीजिए — क्रम से

पहला कदम — तारीखें लिख लीजिए। वेतन अवधि कब खत्म हुई, वेतन कब मिलना चाहिए था, कब मिला या अब तक नहीं मिला — ये तीन तारीखें लिखिए। देरी की गिनती इन्हीं से होगी।

दूसरा कदम — वेतन पर्ची और हाज़िरी का मिलान कीजिए। पर्ची में कुल वेतन, कटौतियों के नाम और हाथ में आई रकम देखिए। हाज़िरी से मिलान कीजिए कि अनुपस्थिति के दिन सही गिने गए हैं या नहीं।

तीसरा कदम — मालिक या ठेकेदार को लिखित में पूछिए। मौखिक बातचीत का रिकॉर्ड नहीं रहता। छोटा पत्र दीजिए — वेतन कब तक मिलना था, कितना बाकी है, कौन-सी कटौती किस कारण से हुई है, यह लिखित में बताएँ। प्रति सँभालकर रखिए।

चौथा कदम — साथी मज़दूरों से अकेले में बात कीजिए। कई लोगों के साथ यही हो रहा हो, तो तथ्य एक जैसे रहेंगे, पर हर व्यक्ति अपनी शिकायत खुद लिखे। किसी के दबाव में झूठा तथ्य मत लिखिए।

पाँचवाँ कदम — जवाब न मिले तो शिकायत कीजिए। लिखित पूछताछ के बाद भी वेतन न मिले या जवाब न आए, तो नीचे बताए मंच पर शिकायत कीजिए।

✓ सीधा नियम: पहले लिखित में पूछिए, फिर शिकायत कीजिए। जिस मज़दूर के पास लिखित पूछताछ और वेतन पर्ची होती है, उसकी शिकायत सबसे पहले सुनी जाती है।

शिकायत कहाँ करें — सही मंच पहचानिए

शिकायत का पहला मंच ज़िले का श्रम कार्यालय होता है। वहाँ श्रम अधिकारी या निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता के पास वेतन न मिलने या गलत कटौती की शिकायत दी जा सकती है। नई संहिता में निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता का काम सिर्फ जुर्माना लगाना नहीं, पहले अनुपालन करवाना भी है — कई मामलों में अधिकारी के हस्तक्षेप से ही वेतन मिल जाता है।

शिकायत में ये बातें ज़रूर लिखिए — आपका नाम और पता, प्रतिष्ठान और ठेकेदार का नाम-पता, काम की प्रकृति, वेतन की दर, वेतन अवधि, बकाया या गलत कटी रकम, और पहले की लिखित पूछताछ की प्रति। काग़ज़ों की प्रति अपने पास रखिए, मूल किसी को मत दीजिए।

हरियाणा में काम करने वाले अपने ज़िले के श्रम कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं — पता श्रम विभाग की सूची से देखा जा सकता है। कई राज्यों में श्रम विभाग के ऑनलाइन माध्यम से भी शिकायत दर्ज होती है — अपने राज्य की आधिकारिक जानकारी से वर्तमान माध्यम की पुष्टि कर लीजिए। शिकायत में सिर्फ सच लिखिए; बढ़ा-चढ़ाकर लिखी रकम या गलत तारीख आपकी विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचाती है।

जाँच सूची — शिकायत से पहले इसे पूरा कर लीजिए

✓ वेतन अवधि और भुगतान की तय तारीख लिख ली गई है।
✓ वेतन पर्ची सुरक्षित है, या न मिलने पर लिखित माँग की गई है।
✓ हाज़िरी से अनुपस्थिति के दिनों का मिलान कर लिया गया है।
✓ मालिक या ठेकेदार को लिखित में पूछा गया है, प्रति रखी गई है।
✓ बकाया और गलत कटी रकम अलग-अलग गिनी गई है।
✓ नियुक्ति, पहचान और ठेका पत्र की प्रतियाँ एक फाइल में हैं।
✓ शिकायत में सिर्फ काग़ज़ से साबित होने वाले तथ्य लिखे गए हैं।
✓ ज़िले के श्रम कार्यालय का पता और माध्यम पता कर लिया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1 — वेतन पाँच दिन देर से मिला है, क्या शिकायत कर सकते हैं?
पहले तय समय-सीमा देखिए। छोटे प्रतिष्ठान में सातवें दिन तक और बड़े में दसवें दिन तक वेतन मिलना चाहिए। इस सीमा के बाद की देरी पर लिखित पूछताछ, फिर शिकायत का रास्ता बनता है।

प्रश्न 2 — मालिक कहता है कि काम कम हुआ, इसलिए वेतन काटा है, क्या यह सही है?
अपने आप नहीं। काम कम होना कानून में लिखा कटौती का कारण नहीं है। सिर्फ कानून में लिखी कटौतियाँ ही हो सकती हैं, और उनका कारण पर्ची में साफ दिखना चाहिए।

प्रश्न 3 — ठेकेदार से काम करता हूँ, शिकायत किसके खिलाफ होगी?
ठेकेदार और मुख्य प्रतिष्ठान — दोनों का नाम-पता लिखिए। काग़ज़ से तय होगा कि भुगतान की ज़िम्मेदारी किसकी थी। ठेका पत्र और हाज़िरी रिकॉर्ड साथ रखिए।

प्रश्न 4 — नौकरी छोड़ दी है, पुराना वेतन नहीं मिला, क्या करूँ?
बकाया वेतन दूसरे कामकाजी दिन तक मिलना चाहिए। लिखित में हिसाब माँगिए, न मिलने पर ज़िले के श्रम कार्यालय में शिकायत कीजिए।

प्रश्न 5 — वेतन पर्ची ही नहीं मिलती, तो कटौती कैसे साबित करूँ?
पर्ची माँगने का लिखित पत्र ही पहला सबूत बनता है। बैंक में आई रकम, हाज़िरी रिकॉर्ड और साथियों के बयान भी काम आते हैं। पर्ची न देना भी शिकायत में लिखिए।

यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है, किसी व्यक्ति के मामले की कानूनी सलाह नहीं है। बड़ी रकम, नौकरी छूटने या विवाद की स्थिति में कोई बड़ा कदम उठाने से पहले अनुभवी वकील से सलाह ज़रूर लीजिए। कानून और विभागीय प्रक्रिया समय-समय पर बदलती रहती है, इसलिए शिकायत से पहले संबंधित कार्यालय की वर्तमान जानकारी ज़रूर देख लीजिए।

Rohit Suhan
आसान भाषा में कानूनी जानकारी — हर भारतीय के लिए।

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