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कार्यस्थल पर उत्पीड़न की शिकायत कहाँ करें — POSH कानून, आंतरिक समिति और SHe-Box की पूरी जानकारी

📅 5 November 2026 • ⏱️ 10 मिनट में पढ़ें • ✍️ Rohit Suhan

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पहले यह तय कर लीजिए — यह लेख किसके लिए है, किसके लिए नहीं

यह लेख उनके लिए है जो किसी दफ्तर, कारखाने, स्कूल, अस्पताल या दुकान में काम करती हैं और वहाँ उन्हें ऐसा व्यवहार झेलना पड़ा है जो उन्हें असहज या असुरक्षित करता हो। यह उनके लिए भी है जो किसी संस्था के मालिक, प्रबंधक या मानव संसाधन का काम देखते हैं और अपनी ज़िम्मेदारी ठीक से समझना चाहते हैं।

यह लेख उनके लिए नहीं है जो सिर्फ सामान्य बहस या पदोन्नति न मिलने की नाराज़गी को उत्पीड़न का नाम देना चाहते हैं। हर अप्रिय बात उत्पीड़न नहीं होती, और हर उत्पीड़न सिर्फ अप्रिय बात नहीं होती। दोनों के बीच का फर्क ही इस लेख का केंद्र है, क्योंकि गलत श्रेणी में शिकायत करने से सही शिकायत भी कमज़ोर पड़ जाती है।

शुरू में ही एक बात साफ कर दी जाए। उत्पीड़न की शिकायत करने वाली महिला को अदालत जाने से पहले ही एक रास्ता मिलता है — अपनी काम की जगह की आंतरिक समिति। यह रास्ता 2013 के एक विशेष कानून से बना है, जिसका पूरा नाम कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 है। आम बोलचाल में इसे POSH कानून कहते हैं, जो 9 दिसंबर 2013 से लागू है।

एक पंक्ति में बात: काम की जगह पर यौन उत्पीड़न की शिकायत पहले आंतरिक समिति को लिखित में की जाती है, और जहाँ ऐसी समिति बननी ही नहीं है, वहाँ जिले की स्थानीय समिति को। शिकायत की समय-सीमा तीन महीने है, जिसे कारण बताकर तीन महीने और बढ़ाया जा सकता है।

कौन-कौन इस कानून के दायरे में आता है

इस कानून की सबसे बड़ी खूबी इसका चौड़ा दायरा है। यह सिर्फ सरकारी दफ्तरों या बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं है। निजी कंपनी, स्कूल, अस्पताल, दुकान, गैर-सरकारी संस्था, घरेलू काम की जगह — सभी इसके दायरे में आते हैं, संगठित क्षेत्र हो या असंगठित।

शिकायत करने वाली महिला का स्थायी कर्मचारी होना ज़रूरी नहीं है। ठेके पर काम करने वाली, अस्थायी, प्रशिक्षु, इंटर्न, दैनिक मज़दूरी पर काम करने वाली, यहाँ तक कि काम की जगह पर आने वाली ग्राहक या आगंतुक महिला भी शिकायत कर सकती है, अगर उत्पीड़न काम की जगह से जुड़ा हो।

शिकायत सिर्फ अपने साथ काम करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध ही हो, यह भी ज़रूरी नहीं है। हाल में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि महिला अपनी काम की जगह की समिति से शिकायत कर सकती है, भले ही दूसरा व्यक्ति किसी दूसरे नियोक्ता के यहाँ काम करता हो — शर्त यही है कि घटना काम की जगह से जुड़ी हो।

क्या-क्या उत्पीड़न माना जाता है — और क्या नहीं

कानून में यौन उत्पीड़न की परिभाषा जानबूझकर चौड़ी रखी गई है। इसमें अवांछित शारीरिक संपर्क, यौन संबंध की माँग, यौन रंग वाली टिप्पणी, अश्लील सामग्री दिखाना, और कोई भी ऐसा शारीरिक, मौखिक या गैर-मौखिक आचरण शामिल है जो यौन स्वभाव का हो और महिला की इच्छा के विरुद्ध हो। अगर तरक्की, वेतन-वृद्धि या नौकरी बने रहने के लिए किसी यौन माँग को मानने को कहा जाए, या मना करने पर धमकी दी जाए, तो वह भी इसी श्रेणी में आता है।

उत्पीड़न माना जा सकता हैआमतौर पर उत्पीड़न नहीं माना जाता
बार-बार अश्लील टिप्पणी, इशारे या संदेश, मना करने के बाद भी पीछा करनाकाम की गुणवत्ता पर सख्त लेकिन शालीन टिप्पणी, समय पर काम माँगना
तरक्की या नौकरी के बदले यौन संबंध की माँग, मना करने पर धमकीपदोन्नति न मिलना, जब कारण काम का मूल्यांकन हो
बिना सहमति छूना, अश्लील चित्र दिखाना, यौन रंग की बातेंसामान्य शिष्टाचार वाली बातचीत, पेशेवर चर्चा

यह तालिका फैसला नहीं देती, सिर्फ दिशा दिखाती है। हर मामले की अपनी परिस्थितियाँ होती हैं — क्या कहा गया, कितनी बार, किस संदर्भ में, और उससे महिला पर क्या असर पड़ा। इसीलिए शिकायत में घटना का पूरा ब्योरा लिखना सबसे ज़रूरी होता है, न कि सिर्फ एक शब्द में आरोप लगाना।

आंतरिक समिति कैसे बनती है — और इसमें कौन होता है

जिस काम की जगह पर दस या उससे ज़्यादा कर्मचारी काम करते हैं, वहाँ नियोक्ता को आंतरिक समिति बनाना अनिवार्य है — सिर्फ काग़ज़ पर नहीं, बल्कि सदस्यों के नाम, संपर्क और शिकायत की प्रक्रिया सबको दिखाई देने वाली जगह पर होनी चाहिए। समिति की अध्यक्षता वरिष्ठ स्तर की महिला करती है, कम से कम आधे सदस्य महिलाएँ होती हैं, और एक बाहरी सदस्य भी अनिवार्य है, जो महिला मुद्दों या कानून के क्षेत्र में काम करता हो और संस्था से जुड़ा न हो। बाहरी सदस्य इसलिए रखा जाता है ताकि जाँच पर संस्था के अंदर के दबाव का असर न पड़े।

दस से कम कर्मचारी वाली जगहों पर आंतरिक समिति अनिवार्य नहीं है, पर कानून वहाँ भी लागू रहता है। ऐसी जगहों की शिकायतें जिले के अधिकारी द्वारा बनाई गई स्थानीय समिति को जाती हैं। अगर शिकायत नियोक्ता के विरुद्ध ही है, तो भी स्थानीय समिति ही सुनवाई करती है।

सावधान: दस से ज़्यादा कर्मचारी हों और आंतरिक समिति न हो, तो यह कानून का उल्लंघन है — पचास हज़ार रुपये तक का जुर्माना, और दोबारा उल्लंघन पर दोगुना जुर्माना व लाइसेंस रद्द होने का खतरा।

शिकायत की पूरी प्रक्रिया — कदम-दर-कदम

कदम 1 — लिखित शिकायत तैयार करें। घटना की तारीख़, समय, जगह, क्या हुआ, कौन मौजूद था, और उसके बाद क्या-क्या हुआ — सब साफ-साफ लिखिए। संदेश, ईमेल या गवाहों के नाम हों तो उनका ज़िक्र भी कीजिए।

कदम 2 — सही समिति को शिकायत सौंपें। दस या अधिक कर्मचारी वाली जगह पर आंतरिक समिति को, छोटी जगह पर या नियोक्ता के विरुद्ध शिकायत हो तो जिले की स्थानीय समिति को। एक प्रति अपने पास रखिए और प्राप्ति का सबूत लीजिए।

कदम 3 — सुलह का विकल्प, अगर आप चाहें। जाँच से पहले, आपकी लिखित इच्छा पर, समिति दोनों पक्षों में सुलह का प्रयास कर सकती है। सुलह में पैसे का लेन-देन नहीं हो सकता, और एक बार सुलह हो जाए तो उसी मामले पर दोबारा जाँच नहीं होगी।

कदम 4 — जाँच में दोनों पक्षों को सुना जाता है। समिति शिकायतकर्ता और दूसरे पक्ष, दोनों को अपना पक्ष रखने का मौका देती है। पूरी प्रक्रिया गोपनीय रहती है।

कदम 5 — रिपोर्ट और नियोक्ता की कार्रवाई। आरोप साबित होने पर लिखित माफी, चेतावनी, वेतन-वृद्धि रोकना, निलंबन या नौकरी से हटाने तक की सिफारिश हो सकती है, साथ में पीड़ित महिला को मुआवज़ा देने की सिफारिश भी।

समय-सीमा की पूरी तालिका — देर कहाँ तक माफ है

चरणसमय-सीमा
शिकायत दर्ज करनाघटना से 3 महीने के भीतर; लगातार घटनाओं की श्रृंखला हो तो आखिरी घटना से 3 महीने
शिकायत की अवधि बढ़ानासमिति कारण दर्ज करके 3 महीने और बढ़ा सकती है — कुल मिलाकर 6 महीने से ज़्यादा नहीं
जाँच पूरी करनाशिकायत मिलने से 90 दिन के भीतर
रिपोर्ट के बाद नियोक्ता की कार्रवाईरिपोर्ट मिलने से 60 दिन के भीतर
फैसले के विरुद्ध अपील90 दिन के भीतर, कानून में बताए गए अधिकारी या न्यायाधिकरण के समक्ष

समय-सीमा की यह सख्ती जानबूझकर रखी गई है। देर से की गई शिकायत में सबूत मिट जाते हैं और गवाह भूल जाते हैं। पर देर का मतलब अपने आप खारिज होना नहीं है — समिति यह देखेगी कि देर का कारण क्या था। बीमारी, डर या दबाव जैसे कारणों को गंभीरता से लिया जा सकता है। फिर भी, जहाँ तक हो सके, शिकायत जल्दी करना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है।

जाँच के दौरान मिलने वाली अंतरिम राहत

जाँच के दौरान उसी व्यक्ति के साथ काम करना सबसे कठिन दौर होता है। इसीलिए शिकायतकर्ता की लिखित माँग पर समिति तबादले, तीन महीने तक के अतिरिक्त अवकाश, या दूसरे पक्ष को काम की निगरानी से हटाने जैसी अंतरिम राहत की सिफारिश कर सकती है। यह राहत फैसला नहीं, सुरक्षा का उपाय है।

SHe-Box — ऑनलाइन शिकायत का सरकारी मंच

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने SHe-Box नाम का ऑनलाइन मंच बनाया है, जहाँ उत्पीड़न की शिकायत ऑनलाइन दर्ज की जा सकती है। दर्ज होने के बाद शिकायत संबंधित आंतरिक समिति या स्थानीय समिति को भेज दी जाती है, और शिकायतकर्ता उसकी स्थिति ऑनलाइन देख सकता है।

SHe-Box कोई अलग कानून नहीं है — वह POSH शिकायत को पहुँचाने का डिजिटल रास्ता भर है; जाँच और फैसला अब भी समिति ही करती है। ऑनलाइन शिकायत के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के आधिकारिक SHe-Box मंच का ही इस्तेमाल करें।

पाँच ग़लतियाँ जो शिकायत को कमज़ोर कर देती हैं

पहली ग़लती — सबूत सँभालकर न रखना। संदेश, ईमेल, चित्र या गवाहों के नाम समय रहते सुरक्षित कर लीजिए; देर होने पर सबूत मिलना मुश्किल हो जाता है।

दूसरी ग़लती — सिर्फ मौखिक शिकायत पर भरोसा करना। जाँच लिखित शिकायत से ही शुरू होती है, इसलिए लिखित शिकायत की प्रति और प्राप्ति का सबूत अपने पास ज़रूर रखिए।

तीसरी ग़लती — गोपनीयता तोड़ देना। जाँच के दौरान शिकायत की जानकारी सोशल मीडिया पर डालना शिकायतकर्ता के लिए भी नुकसानदेह हो सकता है; कानून में गोपनीयता भंग करने पर भी कार्रवाई का प्रावधान है।

चौथी ग़लती — नौकरी छोड़कर चुप हो जाना। नौकरी छोड़ने के बाद भी, समय-सीमा के भीतर, शिकायत की जा सकती है — पर जितनी देर होगी, जाँच उतनी ही कठिन होगी।

पाँचवीं ग़लती — झूठी या बदले की शिकायत करना। जाँच में शिकायत झूठी और दुर्भावना से की गई पाई जाए तो शिकायतकर्ता के विरुद्ध भी कार्रवाई हो सकती है। यह प्रावधान इसलिए है ताकि सच्ची शिकायतों पर भरोसा बना रहे।

नियोक्ता की ज़िम्मेदारी — सिर्फ समिति बनाना काफी नहीं

कानून नियोक्ता से सिर्फ समिति बनाने की उम्मीद नहीं करता। नियोक्ता को काम की जगह पर कानून के प्रावधान प्रदर्शित करने हैं, कर्मचारियों को जागरूक करना है, समिति के सदस्यों को प्रशिक्षण दिलाना है, और हर साल की रिपोर्ट तैयार करनी है। सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी यह है कि शिकायत आने पर नियोक्ता समिति की रिपोर्ट पर तय समय में कार्रवाई करे — रिपोर्ट को दराज़ में डाल देना भी कानून का उल्लंघन है। शिकायतकर्ता के विरुद्ध बदले की कार्रवाई, जैसे तबादला करके दंड देना या नौकरी से निकालना, भी गलत है।

समिति के नाम और संपर्क, शिकायत की लिखित प्रति और प्राप्ति का सबूत, घटना का पूरा ब्योरा, और 3 महीने / 90 दिन / 60 दिन की समय-सीमा का हिसाब — ये पाँच बातें शिकायतकर्ता के पास हमेशा सुरक्षित रहनी चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. शिकायत कितने दिन के भीतर करनी चाहिए?
घटना से तीन महीने के भीतर। समिति कारण दर्ज करके तीन महीने और बढ़ा सकती है, पर कुल छह महीने से ज़्यादा नहीं।

2. मेरी संस्था में दस से कम कर्मचारी हैं, तो कहाँ शिकायत करूँ?
जिले की स्थानीय समिति को। जानकारी जिला प्रशासन या महिला एवं बाल विकास विभाग के कार्यालय से मिल सकती है।

3. क्या शिकायत करने पर मेरी पहचान सबको पता चल जाएगी?
नहीं। जाँच की गोपनीयता अनिवार्य है, और गोपनीयता भंग करने वाले पर भी कार्रवाई हो सकती है।

4. जाँच के दौरान क्या मुझे उसी व्यक्ति के साथ काम करना पड़ेगा?
ज़रूरी नहीं। आपकी लिखित माँग पर तबादले, अतिरिक्त अवकाश या काम की निगरानी से हटाने जैसी अंतरिम राहत की सिफारिश हो सकती है।

5. शिकायत झूठी निकली तो क्या होगा?
अगर शिकायत झूठी और दुर्भावना से की गई पाई जाए, तो शिकायतकर्ता के विरुद्ध सेवा नियमों के अनुसार कार्रवाई हो सकती है। पर सिर्फ सबूत न मिलना, झूठी शिकायत के बराबर नहीं है।

6. क्या समिति के फैसले के विरुद्ध अपील हो सकती है?
हाँ। कानून में बताए गए अधिकारी या न्यायाधिकरण के समक्ष, 90 दिन के भीतर अपील की जा सकती है।

आखिरी बात — शिकायत करना कमज़ोरी नहीं, कानून का इस्तेमाल है। जो महिला चुप रहती है, वह सिर्फ खुद नहीं, अगली महिला के लिए भी रास्ता बंद कर देती है। लिखित शिकायत की तैयारी आज ही शुरू कीजिए — समय-सीमा आपका इंतज़ार नहीं करेगी।

अस्वीकरण: यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है, किसी व्यक्ति विशेष के मामले की सलाह नहीं है। बड़े या पेचीदा फैसले लेने से पहले किसी अनुभवी वकील से सलाह अवश्य लें। नियम राज्य और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकते हैं, इसलिए संबंधित कार्यालय से भी पुष्टि कर लें।

Rohit Suhan
आसान भाषा में कानूनी जानकारी — हर भारतीय के लिए।

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