🏠 होमSarkari YojnaUncategorizedकानूनी जानकारी
कानूनी जानकारी

घरेलू हिंसा में महिला के अधिकार 2026: मारपीट के बिना भी कानून आपके साथ है

📅 5 October 2026 • ⏱️ 10 मिनट में पढ़ें • ✍️ Rohit Suhan

💡 ऊपर header में 🌙/☀️ दबाओ — पूरा पेज light/dark switch होगा

🆘 अगर आप इस वक्त खतरे में हैं — पहले ये 3 काम कीजिए, लेख बाद में पढ़िएगा

  1. 181 पर फोन कीजिए — यह महिला सहायता हेल्पलाइन है, चौबीसों घंटे चलती है। फोन पर ही परामर्श, पुलिस और आश्रय की मदद मिल जाती है। हरियाणा में 1091 भी महिला पुलिस हेल्पलाइन है, और तुरंत पुलिस चाहिए तो 100।
  2. पास में कोई सखी वन स्टॉप सेंटर (हर जिले में होता है) या महिला थाना है तो सीधे वहाँ जाइए — वहाँ पुलिस, डॉक्टर, वकील और अस्थायी रहने की जगह एक ही छत के नीचे मिलती है।
  3. जो भी हुआ है, उसका सबूत संभालकर रखिए — चोट की तस्वीर, डॉक्टर की पर्ची, धमकी भरे संदेश, गवाहों के नाम। नीचे बताया गया है कि ये सबूत अदालत में आपकी सबसे बड़ी ताकत कैसे बनते हैं।

सबसे पहली बात: कानून ने “घरेलू हिंसा” का मतलब बहुत बड़ा रखा है

ज़्यादातर महिलाएँ इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें लगता है — “मारपीट तो हुई नहीं, फिर शिकायत किस बात की करूँ?” यहीं सबसे बड़ी गलती होती है। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 3 में घरेलू हिंसा के चार रूप गिनाए गए हैं, और मारपीट उनमें से सिर्फ एक है:

हिंसा का रूप कानून की नज़र में क्या-क्या आता है
शारीरिक मारना-पीटना, धक्का देना, जलाना, या शरीर को किसी भी तरह का नुकसान पहुँचाना।
यौन ज़बरदस्ती का यौन व्यवहार, या महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला कोई कृत्य।
मौखिक और भावनात्मक रोज़ गाली देना, बेइज़्ज़त करना, धमकाना, “तुम्हारे मायके वालों को देख लूँगा” जैसी बातें, या बच्चे छीन लेने की धमकी।
आर्थिक घर का खर्च न देना, कमाने से रोकना, महिला की कमाई छीन लेना, स्त्रीधन (शादी में मिला सामान-गहने) बेच देना या लौटाने से इनकार करना।

यह बात बहुत कम लोग जानते हैं: पति अगर घर का खर्च देना बंद कर दे, पत्नी को नौकरी करने से रोके, या उसके गहने बेच दे — तो यह भी कानूनन घरेलू हिंसा है, भले ही एक थप्पड़ भी न लगा हो। अदालत में ऐसे मामलों में राहत मिली है। इसलिए “मारपीट नहीं हुई” कहकर अपने हक़ से पीछे मत हटिए।

कौन शिकायत कर सकता है, किसके खिलाफ — यहाँ सबसे बड़ा भ्रम है

लोग समझते हैं कि यह कानून सिर्फ शादीशुदा औरतों के लिए है और सिर्फ पति के खिलाफ मामला बनता है। दोनों बातें आधी-अधूरी हैं। कानून में “घरेलू संबंध” (डोमेस्टिक रिलेशनशिप) का दायरा जानबूझकर बड़ा रखा गया है:

  • पत्नी के साथ-साथ मां, बहन, बेटी, विधवा — घर में साथ रहने वाली कोई भी महिला शिकायत कर सकती है। यानी सास अगर बहू को सताए तो बहू, और बेटा अगर मां को मारे-पीटे तो मां — दोनों को यह अधिकार है।
  • लिव-इन साथी भी इसके दायरे में आती है, अगर रिश्ता “शादी जैसा” रहा हो — सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रा सरमा बनाम वी.के.वी. सरमा (2013) में यह साफ किया था।
  • शिकायत सिर्फ पुरुषों के खिलाफ नहीं होती। 2016 में सुप्रीम कोर्ट के हीराल पी. हरसोरा वाले फैसले के बाद कानून की परिभाषा से “वयस्क पुरुष” शब्द हट गया — अब सास-ननद जैसी महिला रिश्तेदारों को भी मामले में पक्षकार बनाया जा सकता है।
  • तलाक के लिए अर्जी देना ज़रूरी नहीं। पति के साथ रहते हुए भी, और बिना तलाक माँगे भी, यह मामला चल सकता है।

कानून के 5 हथियार जो हर पीड़ित महिला के काम आते हैं

शिकायत के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) महिला को एक साथ कई तरह की राहत दे सकता है। इन्हें एक-एक करके समझिए — यही इस कानून की असली ताकत है:

राहत (धारा) इससे महिला को क्या मिलता है
सुरक्षा आदेश (धारा 18) अदालत सताने वाले को रोक देती है — न हिंसा करेगा, न घर या दफ्तर के आसपास आएगा, न फोन-संदेश से संपर्क करेगा, न साझा खाते या स्त्रीधन को हाथ लगाएगा।
निवास आदेश (धारा 19) महिला को घर से निकाला नहीं जा सकता। ज़रूरत पड़े तो अदालत सताने वाले को ही घर छोड़ने का आदेश दे सकती है, या महिला के लिए अलग रहने का इंतज़ाम करा सकती है।
आर्थिक राहत (धारा 20) इलाज का खर्च, कमाई का नुकसान, घर का खर्चा, बच्चों की परवरिश — इन सबके लिए हर महीने या एकमुश्त रकम दिलाई जा सकती है।
बच्चों की हिरासत (धारा 21) बच्चों की अस्थायी हिरासत मां को मिल सकती है। दूसरे पक्ष को मिलने का समय तभी, जब वह बच्चों के लिए सुरक्षित हो।
मुआवज़ा (धारा 22) मानसिक पीड़ा और भावनात्मक नुकसान के लिए अलग से हर्जाना दिलाया जा सकता है।

तुरंत राहत भी संभव है: धारा 23 के तहत मजिस्ट्रेट पूरी सुनवाई से पहले ही अंतरिम या एकपक्षीय आदेश दे सकता है — यानी शपथपत्र के आधार पर फौरन सुरक्षा। महीनों इंतज़ार करने की नौबत नहीं आती।

“ससुराल का घर छोड़ना पड़ेगा” — यह डर सबसे ज़्यादा महिलाओं को चुप रखता है

शिकायत करने से पहले ज़्यादातर महिलाओं के मन में एक ही सवाल घूमता है — “शिकायत की तो घर से निकाल देंगे, जाऊँगी कहाँ?” इसी डर को खत्म करने के लिए कानून में धारा 17 रखी गई है: घरेलू संबंध वाली हर महिला को साझा गृह में रहने का अधिकार है — चाहे उस घर पर उसका नाम हो या न हो, चाहे वह किराए का हो या ससुराल वालों के नाम पर।

2020 में सुप्रीम कोर्ट ने सतीश चंदर आहूजा बनाम स्नेहा आहूजा में साफ कहा — अगर वह घर महिला का वैवाहिक घर (शादी के बाद जहाँ वह रही) है, तो ससुर के नाम पर होने के बावजूद वह साझा गृह माना जाएगा, और बहू को वहाँ से बेदखल नहीं किया जा सकता। यानी “यह घर तो हमारे नाम है, निकल जाओ” — यह धमकी कानूनन खोखली है।

शिकायत करने के 6 ठोस कदम — आज से शुरुआत ऐसे करें

1
सबूत संभालकर रखिए। चोट की तस्वीरें, डॉक्टर की पर्ची व रिपोर्ट, धमकी भरे संदेशों के स्क्रीनशॉट, गवाहों (पड़ोसी, रिश्तेदार) के नाम-पते। तारीख के साथ एक डायरी में घटनाएँ लिखती जाएँ — अदालत में तारीखवार ब्योरा बहुत मज़बूत सबूत बनता है।
2
181 पर कॉल कीजिए या सखी केंद्र जाइए। हेल्पलाइन पर परामर्श के साथ-साथ पुलिस, अस्पताल और आश्रय की मदद जोड़ी जाती है। सखी वन स्टॉप सेंटर में ये सारी सुविधाएँ एक ही जगह मिलती हैं — और पहचान गुप्त रखने की कोशिश की जाती है।
3
सुरक्षा अधिकारी (प्रोटेक्शन ऑफिसर) से मिलिए। हर राज्य सरकार जिलेवार सुरक्षा अधिकारी नियुक्त करती है — यही वह सरकारी अफसर है जो आपकी घरेलू घटना रिपोर्ट तैयार करता है, मजिस्ट्रेट के पास आवेदन लगाने में मदद करता है, और आश्रय व कानूनी सहायता दिलाता है। महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यालय से इसका पता मिल जाएगा।
4
मजिस्ट्रेट के पास आवेदन (धारा 12)। पीड़ित महिला खुद, या उसकी ओर से सुरक्षा अधिकारी या कोई अन्य व्यक्ति, न्यायिक मजिस्ट्रेट को आवेदन दे सकता है — सुरक्षा आदेश, निवास आदेश, आर्थिक राहत, हिरासत, मुआवज़ा — एक साथ या अलग-अलग, जैसी ज़रूरत हो।
5
आपराधिक मामला भी बन सकता है। घरेलू हिंसा अधिनियम दीवानी राहत देता है, लेकिन पति या उसके रिश्तेदारों की क्रूरता पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 (पुरानी IPC 498A की जगह, 1 जुलाई 2024 से लागू) के तहत पुलिस में FIR भी हो सकती है — इसमें 3 साल तक की कैद का प्रावधान है। दहेज़ हत्या जैसे गंभीर मामलों में BNS की धारा 80 लागू होती है।
6
मुफ्त कानूनी मदद लीजिए। पैसे की चिंता न करें — 15100 नालसा (राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण) की मुफ्त कानूनी सहायता हेल्पलाइन है। हर जिले में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण मुफ्त वकील उपलब्ध कराता है।

⚠️ हरियाणा में रहने वाली महिलाओं के लिए खास: राज्य में दुर्गा शक्ति ऐप है — मुसीबत में SOS दबाते ही नज़दीकी पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना पहुँचती है। 181 राष्ट्रीय महिला हेल्पलाइन के साथ-साथ 1091 हरियाणा पुलिस की महिला हेल्पलाइन के तौर पर जानी जाती है। हर जिले में सखी वन स्टॉप सेंटर और महिला एवं बाल विकास विभाग के ज़रिए सुरक्षा अधिकारी तैनात हैं — अपने जिले के महिला थाने या जिला उपायुक्त कार्यालय से इनका पता और फोन नंबर ज़रूर नोट कर लें। नंबर बदलते रहते हैं, इसलिए स्थानीय स्तर पर पुष्टि कर लेना बेहतर रहेगा।

5 भ्रम बनाम हकीकत — एक नज़र में

❌ भ्रम ✅ हकीकत
“सिर्फ शादीशुदा औरत शिकायत कर सकती है।” मां, बहन, बेटी, विधवा और शादी जैसे लिव-इन रिश्ते वाली महिला — घरेलू संबंध वाली हर महिला को अधिकार है।
“मारपीट नहीं हुई तो केस नहीं बनेगा।” गाली-गलौज, धमकी, खर्च रोकना, कमाने से रोकना, स्त्रीधन हड़पना — ये सब भी घरेलू हिंसा है (धारा 3)।
“शिकायत की तो ससुराल से निकाल देंगे।” धारा 17 साझा गृह में रहने का अधिकार देती है — घर चाहे जिसके नाम हो, बेदखली पर अदालत रोक लगा सकती है।
“सास-ननद के खिलाफ कुछ नहीं हो सकता।” 2016 के सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद महिला रिश्तेदारों को भी मामले में पक्षकार बनाया जा सकता है।
“वकील के पैसे नहीं हैं, इसलिए चुप हूँ।” 15100 पर मुफ्त कानूनी सहायता मिलती है; सुरक्षा अधिकारी आवेदन में बिना फीस मदद करता है।

आवेदन से पहले की तैयारी — छोटी सी सूची

  • ☐  घटनाओं की तारीखवार डायरी (कब, क्या हुआ, कौन गवाह था)
  • ☐  चोट/नुकसान की तस्वीरें और डॉक्टर की पर्ची-रिपोर्ट
  • ☐  धमकी या गाली-गलौज वाले संदेशों के स्क्रीनशॉट
  • ☐  पहचान पत्र और पते का प्रमाण (आधार, आदि)
  • ☐  शादी से जुड़े दस्तावेज़ (विवाह प्रमाणपत्र/तस्वीरें — अगर विवाहित हैं)
  • ☐  स्त्रीधन की सूची (क्या-क्या मिला था, कहाँ है)
  • ☐  181 / सुरक्षा अधिकारी / सखी केंद्र का नंबर फोन में सहेजकर रखें

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1: क्या तलाक लिए बिना घरेलू हिंसा का मामला चल सकता है?

हाँ, बिल्कुल। यह कानून तलाक से अलग है — पति के साथ रहते हुए भी सुरक्षा आदेश, निवास आदेश और आर्थिक राहत माँगी जा सकती है। तलाक की अर्जी देना कोई शर्त नहीं है।

प्रश्न 2: शिकायत कहाँ दर्ज होगी — थाने में या अदालत में?

दोनों रास्ते हैं। घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत राहत के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास आवेदन (धारा 12) लगता है — इसमें सुरक्षा अधिकारी और सखी केंद्र मदद करते हैं। अगर मारपीट, दहेज़-उत्पीड़न जैसी आपराधिक क्रूरता हुई है, तो थाने में FIR (BNS धारा 85) भी हो सकती है। दोनों एक साथ भी चल सकते हैं।

प्रश्न 3: क्या सास या ननद के खिलाफ भी मामला बन सकता है?

हाँ। सुप्रीम कोर्ट के 2016 के फैसले (हीराल पी. हरसोरा) के बाद महिला रिश्तेदारों को भी मामले में पक्षकार बनाया जा सकता है। अगर सास-ननद हिंसा में शामिल हैं, तो उनके खिलाफ भी आदेश माँगा जा सकता है।

प्रश्न 4: पति घर का खर्च नहीं देता — क्या यह भी घरेलू हिंसा है?

हाँ, यह आर्थिक हिंसा की श्रेणी में आता है (धारा 3)। ऐसे में धारा 20 के तहत आर्थिक राहत — हर महीने खर्चा, बच्चों की परवरिश का पैसा — दिलाई जा सकती है।

प्रश्न 5: मामले में कितना समय लगता है?

कानून में कोशिश है कि आवेदन का निपटारा 60 दिन के भीतर हो, और धारा 23 के तहत अंतरिम आदेश तो शुरुआत में ही मिल सकता है। असल समय अदालत के काम के बोझ पर निर्भर करता है — इसलिए आवेदन में अंतरिम राहत ज़रूर माँगें।

प्रश्न 6: क्या झूठी शिकायत पर भी सज़ा हो सकती है?

हाँ — कानून सुरक्षा देता है, लेकिन झूठे आरोप लगाने पर झूठी शिकायत से जुड़ी धाराओं के तहत कार्रवाई हो सकती है। इसलिए हमेशा सच्ची घटना और सही सबूत के साथ ही आगे बढ़ें।

अंतिम निवेदन: यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी है, किसी की निजी सलाह नहीं। हर परिवार की परिस्थिति अलग होती है — बड़ा फैसला लेने से पहले किसी अनुभवी वकील से ज़रूर सलाह लें। और याद रखिए — मदद माँगना कमज़ोरी नहीं, अधिकार है।

Rohit Suhan
आसान भाषा में कानूनी जानकारी — हर भारतीय के लिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Join WhatsApp Channel