जनवरी 2025 में उत्तराखंड में एक ऐसा क़ानून लागू हुआ, जिसने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर पूरे देश में हलचल मचा दी। अब वहाँ बिना शादी किए साथ रहने वाले जोड़े को एक महीने के अंदर सरकार के पास अपना बयान दर्ज कराना होगा — न कराने पर तीन महीने तक की जेल या दस हज़ार रुपये तक का जुर्माना।
और ये ख़बर सिर्फ़ उत्तराखंड वालों के लिए नहीं है। सुप्रीम कोर्ट पिछले पंद्रह साल में लिव-इन को लेकर कई बड़े फ़ैसले दे चुका है। उनसे लिव-इन में रहने वालों के पाँच ठोस अधिकार बनते हैं — गुजारा भत्ते से लेकर बच्चों की वैधता तक। ज़्यादातर लोगों को इनका पता ही नहीं, और इसी अनजानी का फ़ायदा कोई न कोई उठा लेता है।
इस लेख में समझेंगे — लिव-इन अपराध है या नहीं, कानून किस रिश्ते को मानता है, महिला साथी के अधिकार, बच्चों का हक़, उत्तराखंड का नया पंजीकरण नियम, और रिश्ता टूट जाए तो क्या करना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल पहले — क्या लिव-इन “अपराध” है?
नहीं। सुप्रीम कोर्ट 2010 के खुशबू बनाम कन्नियाम्मल फ़ैसले में साफ़ कह चुका है — दो बालिग़ लोगों का आपसी सहमति से साथ रहना अपराध नहीं है। ये संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और निजी स्वतंत्रता के अधिकार) के दायरे में आता है। समाज की नाराज़गी किसी काम को अपराध नहीं बना सकती।
इसका सीधा मतलब — सिर्फ़ साथ रहने पर आपको कोई अपराधी नहीं कह सकता। न मोहल्ले वाले, न रिश्तेदार, न पुलिस।
एक बात साफ़ रखें: “अपराध नहीं है” का मतलब ये नहीं कि हर रिश्ते को शादी जैसे अधिकार अपने आप मिल जाएँगे। अधिकारों की अपनी शर्तें हैं — वही इस लेख का सबसे ज़रूरी हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट के 5 फ़ैसले जो आपके काम के हैं
लिव-इन पर क़ानून किताबों में एक जगह लिखा नहीं है — ये अधिकार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों से बने हैं। ये पाँच फ़ैसले याद रख लीजिए:
| फ़ैसला | अदालत ने क्या कहा | आपके लिए मतलब |
|---|---|---|
| खुशबू बनाम कन्नियाम्मल (2010) | सहमति से लिव-इन अपराध नहीं; अनुच्छेद 21 की सुरक्षा | सिर्फ़ साथ रहने पर कोई आपको अपराधी नहीं ठहरा सकता |
| डी. वेलुसामी बनाम डी. पचाईअम्मल (2010) | “शादी जैसी प्रकृति” वाले रिश्ते को घरेलू हिंसा कानून का संरक्षण | लंबे, स्थिर रिश्ते में महिला को विवाहित महिला जैसी सुरक्षा |
| इंद्रा सरमा बनाम वी.के.वी. सरमा (2013) | शादीशुदा व्यक्ति से रिश्ता “शादी जैसी प्रकृति” का नहीं | अगर साथी पहले से शादीशुदा है, तो ये सुरक्षा नहीं मिलेगी |
| चनमुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार सिंह कुशवाहा (2011) | लिव-इन में रही महिला को गुजारा भत्ते का हक़ | लंबे साथ के बाद छोड़ी गई महिला भत्ता माँग सकती है |
| तुलसा बनाम दुर्घटिया (2008) | लंबे लिव-इन से जन्मे बच्चे वैध; माता-पिता की खुद कमाई संपत्ति में हिस्सा | बच्चों के हक़ पर रिश्ते के टूटने का असर नहीं पड़ता |
हर लिव-इन को कानून नहीं मानता — ये 4 शर्तें पूरी होनी चाहिए
वेलुसामी फ़ैसले में अदालत ने साफ़ कहा — हर साथ-रहना “शादी जैसी प्रकृति” का रिश्ता नहीं होता। अधिकार तभी, जब ये चार बातें साबित हों:
दोनों विवाह की कानूनी उम्र के हों। लड़की 18 साल और लड़का 21 साल से कम नहीं होना चाहिए। नाबालिग़ के साथ का रिश्ता इस दायरे में कभी नहीं आता।
दोनों शादी करने के योग्य हों। यानी अविवाहित, तलाक़शुदा, विधवा या विधुर हों। पहले से शादीशुदा साथी वाला रिश्ता इस दायरे में नहीं आता।
साथ रहने का फ़ैसला दोनों की मर्ज़ी से हुआ हो। ज़बरदस्ती, धोखे या दबाव में बना रिश्ता इस परिभाषा में नहीं आता।
रिश्ता काफ़ी लंबे समय से चला आ रहा हो, और दोनों ने दुनिया के सामने खुद को पति-पत्नी जैसा जोड़ा बताया हो। छिपकर मिलना या दो-चार महीने का रिश्ता इसमें नहीं गिना जाता।
मतलब साफ़ है: छिपकर चलने वाला, कुछ हफ़्तों का, या शादीशुदा व्यक्ति के साथ चल रहा रिश्ता इन अधिकारों के दायरे में नहीं आता। अदालत रिश्ते की गंभीरता और स्थिरता देखती है।
महिला साथी के 5 ठोस अधिकार
अगर ऊपर वाली शर्तें पूरी होती हैं, तो कानून महिला साथी को ये अधिकार देता है।
1. घरेलू हिंसा से सुरक्षा
मारपीट, गाली-गलौज, धमकी — और पैसे रोकना या ख़र्च पर पूरी पाबंदी — सब घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के दायरे में आते हैं। धारा 2(च) में “घरेलू संबंध” की परिभाषा में “शादी जैसी प्रकृति” का रिश्ता भी शामिल है। अदालत सुरक्षा आदेश, निवास आदेश और आर्थिक राहत — तीनों दे सकती है।
2. गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस)
चनमुनिया फ़ैसले के बाद अदालतें लिव-इन में रही महिला को गुजारा भत्ता दिलाती हैं। अब यही प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 में है। भत्ते की कोई तय रक़म नहीं — साथी की कमाई और आपकी ज़रूरत देखकर अदालत तय करती है।
3. घर में रहने का अधिकार
रिश्ता टूटने पर भी अदालत “निवास आदेश” (धारा 19) दे सकती है, ताकि महिला को तुरंत घर से न निकाला जाए।
4. पुलिस संरक्षण
परिवार या मोहल्ले के लोग धमकाएँ, तो कई उच्च न्यायालयों ने लिव-इन जोड़ों को पुलिस सुरक्षा दिलाई है। दो बालिग़ लोगों को कोई ज़बरदस्ती अलग नहीं कर सकता।
5. आर्थिक राहत
घरेलू हिंसा कानून की धारा 20 के तहत अदालत आर्थिक राहत का आदेश दे सकती है — घर का ख़र्च, इलाज, बच्चों की परवरिश। ये भत्ते से अलग, तुरंत राहत वाला रास्ता है।
बच्चों का क्या होगा — वैधता और संपत्ति का हक़
इस सवाल का जवाब साफ़ है। तुलसा बनाम दुर्घटिया (2008) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा — लंबे लिव-इन रिश्ते से जन्मे बच्चे नाजायज़ नहीं माने जाएँगे। उन्हें माता-पिता की खुद कमाई संपत्ति में विरासत का हक़ मिलेगा, हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत प्रथम श्रेणी के वारिस की तरह।
एक बारीक़ बात — ये हक़ माता-पिता की अपनी कमाई संपत्ति तक है। संयुक्त परिवार की पैतृक संपत्ति पर ये फ़ैसला सीधे लागू नहीं होता। उत्तराखंड के समान नागरिक संहिता में लिव-इन से जन्मे बच्चों को पूरी वैधता और संपत्ति में समान अधिकार दिए गए हैं।
याद रखें: बच्चे की परवरिश और उसके ख़र्च की ज़िम्मेदारी दोनों माता-पिता की है। रिश्ता टूट जाने से बच्चे के हक़ ख़त्म नहीं होते।
उत्तराखंड में नया नियम — लिव-इन का पंजीकरण अब अनिवार्य
27 जनवरी 2025 से उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू है। इसमें लिव-इन को लेकर देश का सबसे सख़्त नियम बना है:
एक महीने के अंदर बयान दर्ज कराएँ। साथ रहना शुरू करने के एक महीने के अंदर दोनों को रजिस्ट्रार के पास “लिव-इन संबंध का बयान” देना होगा — ऑनलाइन भी हो सकता है।
रजिस्ट्रार जाँच करके प्रमाणपत्र देगा। संक्षिप्त जाँच के बाद रजिस्ट्रार पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी करता है। कोई साथी 21 साल से कम का हो तो उसके माता-पिता को सूचना दी जाएगी।
तय समय में पंजीकरण न कराने पर तीन महीने तक की जेल, दस हज़ार रुपये तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। ग़लत जानकारी देने पर तीन महीने की जेल के साथ पच्चीस हज़ार तक जुर्माना है।
लिव-इन जोड़े को मकान देने से पहले मालिक को पंजीकरण प्रमाणपत्र देखना होगा। ऐसा न करने पर मालिक पर बीस हज़ार रुपये तक का जुर्माना लग सकता है।
साथी छोड़कर चला जाए तो महिला अदालत से गुजारा भत्ता माँग सकती है। लिव-इन से जन्मे बच्चों को पूरी वैधता और संपत्ति में समान अधिकार मिले हैं।
ध्यान दें: पंजीकरण की ये बाध्यता सिर्फ़ उत्तराखंड में है। बाकी राज्यों में ऐसा कोई नियम नहीं है।
रिश्ता टूट जाए या साथी छोड़ दे — तुरंत ये 5 काम करें
रिश्ता टूट रहा हो या साथी छोड़ गया हो, तो ये पाँच काम करें:
✓ 1. सबूत सँभालकर रखें
किरायानामा, बिजली-पानी के बिल, बैंक विवरण, साथ की तस्वीरें, संदेश — साथ रहने के सबूत ही आपकी सबसे बड़ी ताक़त हैं। इन्हें डिलीट न करें।
✓ 2. लिखित शिकायत दें
मारपीट या धमकी हो तो नज़दीकी थाने में लिखित शिकायत दें और पावती ज़रूर लें। आपातकाल में 112 पर कॉल कर सकती हैं।
✓ 3. मजिस्ट्रेट के पास आवेदन करें
घरेलू हिंसा कानून के तहत मजिस्ट्रेट से सुरक्षा आदेश, निवास आदेश और आर्थिक राहत माँगी जा सकती है। पहली सलाह मुफ़्त कानूनी सहायता केंद्रों पर भी मिल जाती है।
✓ 4. गुजारा भत्ते का दावा करें
BNSS की धारा 144 के तहत जल्द आवेदन करें — भत्ता आवेदन की तारीख़ से माँगा जा सकता है।
✓ 5. बच्चों के हक़ की लड़ाई अलग से लड़ें
बच्चे की परवरिश का ख़र्च और उसकी संपत्ति का हक़ रिश्ते के टूटने से ख़त्म नहीं होता।
एक ग़लतफ़हमी जो बहुत महँगी पड़ती है
कई लोग समझते हैं — “साथ रह रहे हैं, तो सारे अधिकार अपने आप मिल जाएँगे।” इंद्रा सरमा फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस भ्रम को तोड़ा है। अगर आपका साथी पहले से शादीशुदा है, तो ये रिश्ता “शादी जैसी प्रकृति” का नहीं माना जाएगा — ऐसे में घरेलू हिंसा कानून की सुरक्षा और भत्ते का दावा कमज़ोर पड़ जाता है।
एक क़ानूनी ख़तरा भी है — बिना तलाक़ दूसरी शादी करना द्विविवाह का अपराध है। अगर साथी ने अपनी शादी की बात छिपाकर रिश्ता बनाया है, तो धोखाधड़ी की शिकायत का रास्ता अलग से खुलता है। ऐसी उलझन में किसी अनुभवी वकील से सलाह ज़रूर लें — एक ग़लत क़दम केस कमज़ोर कर सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न: क्या लिव-इन में रहने पर पुलिस गिरफ़्तार कर सकती है?
उत्तर: नहीं। दो बालिग़ लोगों का आपसी सहमति से साथ रहना अपराध नहीं है (खुशबू फ़ैसला, 2010)। बिना किसी अपराध के पुलिस आपको परेशान नहीं कर सकती। परेशान किया जाए तो वरिष्ठ अधिकारी को लिखित शिकायत दें।
प्रश्न: क्या लिव-इन में रही महिला को गुजारा भत्ता मिल सकता है?
उत्तर: हाँ — अगर रिश्ता लंबा और स्थिर रहा हो। अदालतें BNSS की धारा 144 और घरेलू हिंसा कानून के तहत भत्ता दिलाती हैं। रक़म साथी की आय और आपकी ज़रूरत देखकर तय होती है।
प्रश्न: लिव-इन से पैदा बच्चे को पिता की संपत्ति में हिस्सा मिलेगा?
उत्तर: हाँ। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक ऐसे बच्चे वैध माने जाते हैं और उन्हें माता-पिता की खुद कमाई संपत्ति में विरासत का हक़ है। उत्तराखंड में उन्हें पूर्ण वैधता और समान अधिकार मिले हैं।
प्रश्न: क्या उत्तराखंड के बाहर भी लिव-इन का पंजीकरण कराना होगा?
उत्तर: नहीं। पंजीकरण की बाध्यता सिर्फ़ उत्तराखंड के समान नागरिक संहिता में है। बाकी राज्यों में ऐसा कोई नियम नहीं है।
प्रश्न: मकान मालिक सिर्फ़ लिव-इन की वजह से जोड़े को निकाल सकता है?
उत्तर: मकान देना मालिक का निजी फ़ैसला है, पर “लिव-इन में रहते हैं” कहकर ज़बरदस्ती निकालना ग़लत है। उत्तराखंड में मालिक को किरायेदार जोड़े का पंजीकरण प्रमाणपत्र देखना ज़रूरी है।
प्रश्न: लिव-इन में रहते हुए शादी हो जाए तो क्या होगा?
उत्तर: शादी होते ही सारे वैवाहिक अधिकार लागू हो जाते हैं — भत्ता, विरासत, तलाक़ की प्रक्रिया — सब विवाह क़ानून के हिसाब से चलेगा।
अस्वीकरण: ये लेख सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है, किसी व्यक्ति विशेष की कानूनी सलाह नहीं। हर मामला अलग होता है — कोई बड़ा फ़ैसला लेने से पहले किसी अनुभवी वकील से ज़रूर सलाह लें।