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उत्तराधिकार प्रमाणपत्र (सक्सेशन सर्टिफिकेट) कैसे बनवाएं — बैंक के पैसे पाने की पूरी प्रक्रिया (2026)

📅 20 October 2026 • ⏱️ 9 मिनट में पढ़ें • ✍️ Rohit Suhan

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पिताजी गुज़रे, तो रमेश को लगा — बैंक का काम सबसे आसान होगा। खाते में नॉमिनी भी वही था, मृत्यु प्रमाणपत्र भी हाथ में था। पर बैंक की खिड़की पर जवाब मिला: “सिर्फ़ नॉमिनी होने से पैसा नहीं मिलेगा — उत्तराधिकार प्रमाणपत्र लाइए।” रमेश हैरान रह गया — उसे तो लगता था नॉमिनी मतलब मालिक।

ये कहानी हज़ारों परिवारों की है। कागज़ हाथ में, पैसा बैंक में, और बीच में एक ऐसा प्रमाणपत्र जिसका नाम भी बहुतों ने पहली बार सुना होता है। गड़बड़ दो भ्रमों से शुरू होती है: नॉमिनी को मालिक समझ लेना, और लीगल हेयर सर्टिफिकेट को ही “असली” प्रमाणपत्र मान लेना। आज तीनों कागज़ों का फ़र्क और बैंक का पैसा पाने का सही रास्ता — दोनों साफ़-साफ़ समझेंगे।

एक पंक्ति में सार: उत्तराधिकार प्रमाणपत्र (सक्सेशन सर्टिफिकेट) जिला न्यायालय से मिलता है और यही बैंक खाते, सावधि जमा, शेयर व बीमा की रकम वारिसों को दिलाता है। यह भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 372 के तहत बनता है — नॉमिनी या लीगल हेयर सर्टिफिकेट इसका विकल्प नहीं हैं।

सबसे पहले — ये प्रमाणपत्र आख़िर है क्या

सक्सेशन सर्टिफिकेट अदालत का एक आदेश-पत्र है — यह कहता है कि फ़लाँ व्यक्ति को दिवंगत के कर्ज़ों और प्रतिभूतियों की रकम वसूल करने का अधिकार है। बैंक इसी कागज़ को देखकर पैसा देता है।

सबसे बड़ी समझने वाली बात — यह प्रमाणपत्र सिर्फ़ चल संपत्ति के पैसों के लिए है: बचत खाता, सावधि जमा, बीमा की रकम, शेयर-म्यूचुअल फ़ंड, भविष्य निधि का बकाया। यह ज़मीन या मकान की मालिकी नहीं देता। ज़मीन के लिए इंतकाल और वारिस प्रमाणपत्र का रास्ता अलग है।

और एक बात — यह प्रमाणपत्र मालिकाना हक़ का फ़ैसला नहीं करता। यह सिर्फ़ तय करता है कि बैंक या कंपनी किसे पैसा दे — ताकि बैंक बाद में फँसे नहीं।

⚠ साफ़ समझ लें: यह प्रमाणपत्र मिलने से बाकी वारिसों का हक़ खत्म नहीं होता। जिसके नाम सर्टिफिकेट बना है, वह रकम लेकर बाकी कानूनी वारिसों में बाँटने का भरोसेमंद होता है — किसी वारिस को हिस्सा न देना अलग कानूनी विवाद बन सकता है।

5 भ्रम बनाम सच — यहीं सबसे ज़्यादा लोग अटकते हैं

❌ भ्रम ✅ सच
“मैं नॉमिनी हूँ, मतलब पैसा मेरा।” नॉमिनी सिर्फ़ प्राप्तकर्ता है, मालिक नहीं। वह रकम लेकर असली वारिसों को देने का भरोसेमंद होता है।
“लीगल हेयर सर्टिफिकेट बनवा लिया, बैंक का काम हो जाएगा।” लीगल हेयर सर्टिफिकेट तहसीलदार से मिलता है और रिश्ते का सबूत है — बैंक बड़ी रकम पर अक्सर अदालत का प्रमाणपत्र माँगता है।
“वसीयत बनी हुई है, तो ये प्रमाणपत्र नहीं चाहिए।” वसीयत हो तो प्रोबेट या प्रशासन-पत्र का रास्ता बनता है — पर बैंक कभी-कभी फिर भी यही प्रमाणपत्र माँग लेता है।
“तहसील या सरल पोर्टल से ऑनलाइन बन जाएगा।” नहीं — यह सिर्फ़ जिला न्यायालय से मिलता है। कोई तहसील या पोर्टल इसे जारी नहीं करता।
“प्रमाणपत्र मिल गया, मतलब ज़मीन भी मेरी।” बिल्कुल नहीं — यह सिर्फ़ कर्ज़ और प्रतिभूतियों की रकम के लिए है, अचल संपत्ति की मालिकी के लिए नहीं।

तीन कागज़, तीन काम — एक ही नज़र में फ़र्क

इन तीनों को लेकर सबसे ज़्यादा उलझन रहती है। नीचे की तालिका एक बार देख लीजिए:

कागज़ कौन देता है किस काम का
नॉमिनी (नामांकन) खाताधारक खुद, जीते-जी बैंक को बताता है — पैसा पहले किसे देना है। वह व्यक्ति रकम लेकर असली वारिसों को देगा।
कानूनी वारिस प्रमाणपत्र तहसीलदार (सरल पोर्टल से आवेदन) रिश्ते का सबूत — ज़मीन के इंतकाल, पेंशन जैसे कामों के लिए। बैंक की बड़ी रकम पर अक्सर काफ़ी नहीं पड़ता।
उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जिला न्यायालय (अदालत का आदेश) बैंक खाते, सावधि जमा, शेयर, बीमा की रकम वसूल करने का कानूनी अधिकार — यही बैंक माँगता है।

एक व्यावहारिक सच्चाई भी जान लीजिए — बैंकों की अपनी सीमा नीति होती है। बहुत छोटी रकम पर कई बैंक शपथपत्र और क्षतिपूर्ति बंधपत्र लेकर बिना अदालत के प्रमाणपत्र के भी पैसा दे देते हैं। पर रकम बड़ी हो, या वारिसों में मतभेद हो, तो बैंक यही प्रमाणपत्र माँगता है — यही एकमात्र रास्ता बचता है। अपनी शाखा से सीमा ज़रूर पूछें, पर अनुमान पर निर्भर न रहें।

कब ज़रूरी है, कब नहीं — सीधा हिसाब

✔ ज़रूरी है, जब: बैंक लिखित में यही प्रमाणपत्र माँगे; नॉमिनी न बना हो और वारिस कई हों; रकम बड़ी हो; या वारिसों के बीच दावे को लेकर खींचतान हो।

✗ ज़रूरी नहीं, जब: नॉमिनी बना हो, कोई विवाद न हो और बैंक भुगतान को तैयार हो; रकम बैंक की बिना-प्रमाणपत्र सीमा से कम हो; या वसीयत पर प्रोबेट का रास्ता खुला हो।

हरियाणा में आवेदन की पूरी प्रक्रिया — कदम दर कदम

आवेदन धारा 372 के तहत उस जिले के जिला न्यायाधीश के यहाँ होता है जहाँ दिवंगत आम तौर पर रहता था, या जहाँ उसकी संपत्ति है।

1
वकील से सलाह और अर्ज़ी तैयार करें। अर्ज़ी में मृत्यु का समय-स्थान, दिवंगत का पता, सभी नज़दीकी रिश्तेदारों के नाम-पते, आपका दावा किस हक़ से है, और हर परिसंपत्ति का ब्योरा होता है।
2
जिला न्यायालय में अर्ज़ी दाख़िल करें। अर्ज़ी वादपत्र जैसे ही हस्ताक्षरित और सत्यापित होती है। सही न्यायालय में दाख़िल करना सबसे ज़रूरी है — ग़लत जगह की अर्ज़ी महीनों लटका देती है।
3
न्यायालय सूचना जारी करता है। सभी ज्ञात वारिसों को नोटिस भेजा जाता है, और स्थानीय अख़बार में सार्वजनिक सूचना छपती है — ताकि जिसे भी आपत्ति हो, वह सामने आए। आपत्ति के लिए आम तौर पर 45 दिन का समय मिलता है; यह सूचना छोड़ी नहीं जा सकती।
4
सुनवाई में जाँच होती है। न्यायाधीश आवेदक की पहचान, दिवंगत से रिश्ता, परिसंपत्तियों की सूची और बाकी वारिसों की सहमति या आपत्ति की जाँच करते हैं। कोई आपत्ति न हो तो पूरी सुनवाई के बिना ही आदेश हो जाता है — यही आम रास्ता है।
5
न्यायालय शुल्क जमा करें। प्रमाणपत्र जारी होने से पहले परिसंपत्तियों के कुल मूल्य पर आम तौर पर लगभग 3 प्रतिशत शुल्क देना होता है — राज्य के हिसाब से यह अलग हो सकता है, इसलिए अपने जिले के नियम की पुष्टि कर लें।
6
प्रमाणपत्र प्राप्त करें और बैंक में जमा करें। ज़मानत बंधपत्र भी देना पड़ सकता है। फिर बैंक को यह कागज़ दिखाकर रकम प्राप्त करें।

⏱ समय कितना लगेगा: कोई विवाद न हो तो आमतौर पर 5 से 7 महीने। अख़बार की सूचना और 45 दिन की आपत्ति अवधि ही सबसे ज़्यादा समय लेती है। हर पेशी पर हाज़िर रहें; एक छूटी तारीख़ दो-तीन महीने और बढ़ा देती है।

कौन-से कागज़ लगेंगे — पहले से तैयार रखें

  • ✔दिवंगत का मृत्यु प्रमाणपत्र (नगर निगम/पंचायत से)
  • ✔आवेदक का पहचान व पता प्रमाण (आधार, पैन)
  • ✔दिवंगत से रिश्ते का सबूत — जन्म प्रमाणपत्र, विवाह प्रमाणपत्र, परिवार पहचान पत्र या वंशावली
  • ✔हर परिसंपत्ति का ब्योरा — खाता संख्या, सावधि जमा की रसीदें, शेयर/बीमा के दस्तावेज़
  • ✔सभी कानूनी वारिसों की सूची और उनके पहचान प्रमाण
  • ✔शपथपत्र — कि इन्हीं परिसंपत्तियों के लिए कहीं और कोई अर्ज़ी लंबित नहीं है

💡 काम की सलाह: अर्ज़ी से पहले सभी वारिसों की लिखित सहमति ले लें। एक भी आपत्ति आई तो मामला लंबा खिंच सकता है। परिवार में पहले दिन से पारदर्शिता रखें — यही सबसे बड़ा समय बचाने वाला कदम है।

5 ग़लतियाँ जो लोगों को महँगी पड़ती हैं

✗ ग़लती 1 — ग़लत न्यायालय में अर्ज़ी: दिवंगत जहाँ रहता था, वहीं के जिला न्यायालय में अर्ज़ी दें। ग़लत जगह की अर्ज़ी ख़ारिज होकर महीनों बर्बाद कर देती है।

✗ ग़लती 2 — परिसंपत्ति की सूची अधूरी: कोई खाता या जमा छूट गया तो उसके लिए दोबारा प्रक्रिया करनी पड़ेगी। बैंक स्टेटमेंट और पुराने कागज़ खँगालकर पूरी सूची एक ही बार में दें।

✗ ग़लती 3 — न्यायालय शुल्क कम जमा करना: शुल्क परिसंपत्ति के मूल्य के हिसाब से तय होता है। कम शुल्क जमा हुआ तो मामला वहीं अटक जाता है — सही गणना वकील से करवाएँ।

✗ ग़लती 4 — पेशी पर न जाना: एक छूटी तारीख़ पर नई सूचना जारी होती है और दो-तीन महीने बढ़ जाते हैं। हर तारीख़ को खुद या वकील के ज़रिए हाज़िर रहें।

✗ ग़लती 5 — नॉमिनी को ही “मालिक” मानकर रकम बाँट लेना: नॉमिनी रकम लेकर बाकी वारिसों को न दे, तो वारिस अदालत जा सकते हैं। नॉमिनी बने व्यक्ति को भी बँटवारे का हिसाब लिखित में रखना चाहिए।

एक और ज़रूरी बात — यह प्रमाणपत्र किसके नाम पर बनेगा, यह उत्तराधिकार के नियम तय करते हैं। बिना वसीयत की स्थिति में हिंदू परिवारों में पत्नी, माँ, बेटे-बेटियों का बराबर हक़ होता है — बिना वसीयत विरासत के बँटवारे के नियम यहाँ विस्तार से समझाए गए हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल 1: नॉमिनी होने पर भी बैंक प्रमाणपत्र माँग रहा है — क्या बैंक सही है?

हाँ, बैंक ऐसा कर सकता है। नॉमिनी होने से भुगतान आसान होता है, पर विवाद की आशंका या बड़ी रकम पर बैंक को अदालत का प्रमाणपत्र माँगने का हक़ है। नॉमिनी मालिकाना हक़ का सबूत नहीं है।

सवाल 2: क्या यह प्रमाणपत्र तहसील या सरल हरियाणा पोर्टल से बन सकता है?

नहीं — यह सिर्फ़ जिला न्यायालय से मिलता है। तहसील का कानूनी वारिस प्रमाणपत्र अलग कागज़ है, जो बैंक की बड़ी रकम के दावे पर अक्सर काफ़ी नहीं पड़ता।

सवाल 3: वसीयत बनी हुई थी — क्या फिर भी यही प्रमाणपत्र चाहिए?

वसीयत हो तो आमतौर पर प्रोबेट या प्रशासन-पत्र का रास्ता अपनाया जाता है। पर कुछ बैंक वसीयत होने पर भी उत्तराधिकार प्रमाणपत्र माँग लेते हैं — पहले ही पूछ लें कि आपकी शाखा कौन-सा कागज़ स्वीकार करेगी।

सवाल 4: प्रमाणपत्र बनवाने में कुल कितना ख़र्च आएगा?

सबसे बड़ा ख़र्च न्यायालय शुल्क है — आम तौर पर परिसंपत्ति के मूल्य का लगभग 3 प्रतिशत (राज्य के हिसाब से अलग हो सकता है)। इसके अलावा वकील की फ़ीस और अख़बार में सूचना का ख़र्च जुड़ता है।

सवाल 5: क्या इस प्रमाणपत्र से ज़मीन अपने नाम कराई जा सकती है?

नहीं — यह सिर्फ़ बैंक खाते, सावधि जमा, शेयर, बीमा जैसी चल परिसंपत्तियों की रकम के लिए है। ज़मीन के लिए इंतकाल की अलग प्रक्रिया होती है।

सवाल 6: एक वारिस ने आपत्ति दर्ज करा दी तो क्या होगा?

तब मामला विवादित हो जाता है और सुनवाई लंबी खिंच सकती है। इसीलिए अर्ज़ी से पहले सभी वारिसों से बातचीत और लिखित सहमति सबसे समझदारी भरा कदम है।

आख़िर में — कागज़ का काम आज, पैसा कल

बैंक का पैसा अटका हो तो घबराने की नहीं, क्रम से चलने की ज़रूरत है — सही न्यायालय, पूरी सूची, सभी वारिसों की सहमति, हर पेशी पर हाज़िरी। ये चार बातें ठीक रहीं तो पाँच-सात महीने में रकम हाथ में होती है। जीते-जी हर खाते, जमा और बीमा में नॉमिनी ज़रूर बनवाएँ — नॉमिनी मालिक नहीं बनाता, पर बैंक का रास्ता आसान कर देता है।

नोट: यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है — व्यक्तिगत कानूनी सलाह नहीं। बड़ा फ़ैसला लेने से पहले किसी अनुभवी वकील से सलाह ज़रूर लें। शुल्क और प्रक्रिया राज्य के हिसाब से बदल सकती है — ताज़ा जानकारी जिला न्यायालय से ले लें।

Rohit Suhan
आसान भाषा में कानूनी जानकारी — हर भारतीय के लिए।

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