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वारंटी में सामान ठीक नहीं हुआ तो क्या करें — उपभोक्ता के 7 कानूनी अधिकार (2026)

📅 18 October 2026 • ⏱️ 9 मिनट में पढ़ें • ✍️ Rohit Suhan

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सोनीपत के रमेश ने अड़तीस हज़ार का फ्रिज खरीदा था। सातवें महीने में कंप्रेसर बंद हो गया। दुकानदार ने कहा — “घबराओ मत, एक साल की वारंटी है।” लेकिन सेवा केंद्र ने फ्रिज पैंतालीस दिन दबाए रखा, हर हफ़्ते नया बहाना — “पार्ट नहीं आया”, “कारीगर छुट्टी पर है”। जब फ्रिज लौटा, वारंटी के दिन गिने-चुने बचे थे — और दुकानदार की मुस्कान भी गायब थी।

वारंटी कार्ड हाथ में आते ही हम मान लेते हैं कि अब एक-दो साल तक कोई चिंता नहीं — यही सबसे महंगा भ्रम है। वारंटी कोई जादुई कवच नहीं, बल्कि कंपनी का एक लिखित वादा है। वादा टूटने पर कानून आपके साथ है, बशर्ते आप अपने अधिकार जानते हों।

एक पंक्ति में सार: वारंटी अवधि में सामान खराब हो और कंपनी उसे ठीक न करे, तो यह “सेवा में कमी” मानी जाती है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत आप मरम्मत, बदलाव, धनवापसी और क्षतिपूर्ति की माँग कर सकते हैं।

वारंटी असल में होती क्या है — पहले यही समझ लें

वारंटी का सीधा मतलब है — निर्माता या विक्रेता का लिखित वादा कि तय अवधि में खराबी आई, तो वह उसे मुफ़्त ठीक करेगा या पुर्जा बदलेगा। यही लिखित शर्तें आगे आपके दावे की बुनियाद बनती हैं।

वारंटी और गारंटी एक नहीं हैं। मोटे तौर पर: वारंटी में कंपनी सामान ठीक करने या पुर्ज़ा बदलने का वादा करती है, गारंटी में पैसे वापसी का वादा मज़बूत होता है। दुकानदार दोनों शब्द मिलाकर बोलता है, पर कागज़ पर जो लिखा है, वही मायने रखता है।

वारंटी का वादा सिर्फ़ दुकानदार का नहीं — निर्माता कंपनी भी उतनी ही ज़िम्मेदार है। अदालतों के कई फ़ैसलों में कहा गया है कि वारंटी निर्माता की ओर से मिलती है, इसलिए दुकानदार “कंपनी से बात करो” कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकता।

6 बड़े भ्रम बनाम सच्चाई — जो हर ग्राहक को पता होनी चाहिए

वारंटी को लेकर बाज़ार में आधी-अधूरी बातें फैली हैं। सबसे आम भ्रमों का सच —

आम भ्रम कानूनी सच्चाई
वारंटी में मरम्मत हमेशा पूरी तरह मुफ़्त होती है पुर्ज़ा-मरम्मत मुफ़्त, पर घर पर सेवा या लाने-ले जाने का खर्च शर्तों के हिसाब से लग सकता है
बदला हुआ पुर्ज़ा मिला, तो वारंटी नए सिरे से शुरू नहीं। गिनती मूल खरीद की तारीख़ से ही होती है, जब तक लिखित में नई अवधि न मिली हो
वारंटी कार्ड खो गया, तो दावा खत्म नहीं। बिल, भुगतान का प्रमाण, ईमेल या क्रमांक भी दावे के लिए काफ़ी हो सकता है
“पानी लग गया” कहकर कंपनी हर दावा खारिज कर सकती है कंपनी को साबित करना होगा कि खराबी आपकी लापरवाही से हुई — सिर्फ़ कहने से दावा खारिज नहीं होता
ऑनलाइन खरीदा सामान वारंटी में नहीं आता आता है। निर्माता की वारंटी हर जगह लागू होती है
दुकानदार ने कहा “कंपनी से बात करो” — अब वही ज़िम्मेदार नहीं। विक्रेता भी दावे में पक्षकार बन सकता है — दुकानदार ज़िम्मेदारी से भाग नहीं सकता

सेवा केंद्र की 5 आम चालें — और हर चाल का कानूनी जवाब

ऐसे मामलों में सेवा केंद्र अक्सर एक ही तरह के बहाने अपनाता है — इन्हें पहचान लीजिए:

चाल 1: “पुर्ज़ा नहीं है, इंतज़ार कीजिए” — हफ़्तों-महीनों तक सामान दबाए रखना।

जवाब: बिना वाजिब कारण महीनों तक सामान रोकना सेवा में कमी है। लिखित में तय समय माँगें।

चाल 2: “यह खराबी वारंटी में नहीं आती” — बिना जाँच दावा खारिज।

जवाब: कारण लिखित में माँगें — शर्तों में जो खराबी शामिल नहीं, वही बाहर है।

चाल 3: “पानी लग गया है” — बिना सबूत आपकी ग़लती बताना।

जवाब: यह साबित करना कंपनी की ज़िम्मेदारी है — जाँच रिपोर्ट माँगें।

चाल 4: “ठीक तो कर दिया, पर पुराना पुर्ज़ा लगाया है” — घटिया मरम्मत।

जवाब: वारंटी में असली और नया पुर्ज़ा आपका हक़ है। खराबी दोबारा आई तो दोबारा दावा करें।

चाल 5: “सामान ले जाइए, पहले इतने रुपये दीजिए” — मनमाना शुल्क।

जवाब: शर्तों से बाहर के शुल्क पर लिखित बिल माँगें।

सावधान: सामान देते समय जॉब शीट / रसीद ज़रूर लें — बिना रसीद का सामान बाद में मुसीबत बन सकता है।

आपके 7 कानूनी अधिकार — एक-एक करके याद कर लीजिए

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के ये अधिकार वारंटी के मामलों में सीधे काम आते हैं —

✓ अधिकार 1 — मुफ़्त मरम्मत या पुर्ज़ा बदलाव। वारंटी अवधि की खराबी कंपनी अपने खर्च पर ठीक करे — यही वारंटी का मूल वादा है।

✓ अधिकार 2 — बार-बार खराबी पर नया सामान। एक ही खराबी बार-बार आए और ठीक न हो, तो पूरे सामान के बदलाव की माँग करें।

✓ अधिकार 3 — धनवापसी। सामान ठीक न हो सके, तो चुकाई रक़म ब्याज सहित वापस माँगने का हक़।

✓ अधिकार 4 — क्षतिपूर्ति। परेशानी, समय की बर्बादी और मानसिक कष्ट के लिए अलग से मुआवज़ा माँगें।

✓ अधिकार 5 — अपने ज़िले में शिकायत। कंपनी कहीं भी हो, शिकायत अपने रहने वाले ज़िले के आयोग में करें।

✓ अधिकार 6 — बिना वकील, कम खर्च। पाँच लाख तक के दावे पर कोई शुल्क नहीं, वकील भी ज़रूरी नहीं।

✓ अधिकार 7 — दो साल का समय। खराबी पता चलने की तारीख़ से दो साल के अंदर शिकायत करें।

सही क्रम — पहले क्या करें, फिर क्या

अधिकार जानना आधी बात है, सही क्रम में कदम उठाना आधी —

1
कंपनी को लिखित शिकायत भेजें। ईमेल या पत्र में खरीद की तारीख़, मॉडल-क्रमांक और खराबी का ब्यौरा लिखें। सात से पंद्रह दिन में जवाब माँगें — यही पत्र आगे शिकायत की नींव बनेगा।
2
राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन 1915 पर संपर्क करें। जवाब न आए तो 1915 पर कॉल करें या consumerhelpline.gov.in पर शिकायत दर्ज करें — कई मामले यहीं सुलझ जाते हैं।
3
सबूतों की फ़ाइल तैयार रखें। बिल, वारंटी कार्ड, जॉब शीट की रसीद, बातचीत के स्क्रीनशॉट और ख़राब सामान की तस्वीरें — एक फ़ोल्डर में संभालकर रखें। सबूत जितने पक्के, दावा उतना मज़बूत।
4
ई-दाखिल पोर्टल से ऑनलाइन शिकायत दर्ज करें। बात न बने तो edaakhil.nic.in पर ज़िला उपभोक्ता आयोग में ऑनलाइन शिकायत दर्ज करें।

ज़िला उपभोक्ता आयोग में शिकायत — कहाँ, कितना खर्च, क्या मिलेगा

कई लोग “अदालत” शब्द सुनकर ही डर जाते हैं, लेकिन उपभोक्ता आयोग आम अदालत जैसा नहीं है — प्रक्रिया सरल है और आप खुद भी अपना पक्ष रख सकते हैं —

सवाल जवाब
कहाँ शिकायत करें? रक़म पचास लाख तक हो तो ज़िला आयोग में — अपने रहने वाले ज़िले में
शुल्क कितना? पाँच लाख तक कोई शुल्क नहीं; ऊपर मामूली शुल्क
समय-सीमा? खराबी पता चलने से दो साल के अंदर शिकायत ज़रूरी
आयोग क्या आदेश दे सकता है? मरम्मत, बदलाव, ब्याज सहित धनवापसी, क्षतिपूर्ति और मुक़दमे का खर्च
वकील ज़रूरी है? नहीं। आप खुद या प्रतिनिधि के ज़रिए भी कर सकते हैं

पचास लाख से दो करोड़ तक के दावे राज्य आयोग में, इससे ऊपर के राष्ट्रीय आयोग में जाते हैं। घरेलू सामान, मोबाइल, फ्रिज जैसे मामलों में ज़िला आयोग ही काफ़ी होता है।

बिल या वारंटी कार्ड खो गया — तो क्या दावा खत्म?

हज़ारों लोग सिर्फ़ इसी डर से चुप रह जाते हैं — सच यह है कि कागज़ खोना दावा खोना नहीं है।

वारंटी कार्ड खरीद का एक प्रमाण है, इकलौता प्रमाण नहीं। अगर खरीद का बिल, भुगतान की रसीद, बैंक विवरण, ऑनलाइन भुगतान का रिकॉर्ड या कंपनी को भेजा ईमेल है, तो दावा चल सकता है। मोबाइल-लैपटॉप में तो क्रमांक (सीरियल नंबर) से ही खरीद की तारीख़ पता चल जाती है — कंपनी के पास यह रिकॉर्ड पहले से होता है।

कई कंपनियाँ शर्तों में लिखती हैं कि “वारंटी कार्ड के बिना दावा मान्य नहीं।” लेकिन खरीद का कोई और पक्का प्रमाण हो, तो आयोग ऐसी शर्त को अनुचित व्यापार व्यवहार मान सकता है। फिर भी, बिल और कार्ड की तस्वीर फ़ोन में रखें — कागज़ खोए, फ़ोटो न खोए।

एक्सटेंडेड वारंटी का जाल — पैसे देने से पहले यह जान लें

आजकल दुकानदार “एक्सटेंडेड वारंटी” बेचता है — कुछ हज़ार देकर वारंटी बढ़ा लो। यहाँ तीन बातें गाँठ बाँध लें —

पहली — एक्सटेंडेड वारंटी अक्सर बीमा जैसी शर्तों पर चलती है — क्या शामिल है, क्या नहीं, यह मूल वारंटी से अलग हो सकता है। कागज़ पढ़े बिना पैसे न दें।

दूसरी — कई बार यह वारंटी तीसरे पक्ष की कंपनी देती है, सामान बनाने वाली नहीं। दावा करने पर दुकानदार और वह कंपनी एक-दूसरे की तरफ़ इशारा करते हैं। पहले पूछें — दावा किसके पास करना होगा?

तीसरी — पैसे देकर ली गई यह सेवा भी “सेवा” की श्रेणी में आती है — इसमें कमी हुई, तो उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत शिकायत का रास्ता खुला है।

याद रखें: एक्सटेंडेड वारंटी की शर्तें आपकी समझ की भाषा में समझाई जानी चाहिए। सिर्फ़ बारीक अक्षरों वाला कागज़ थमाकर पैसे लेना सही तरीका नहीं — शर्तें समझें, फिर फ़ैसला करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल 1: सेवा केंद्र ने मेरा सामान दो महीने से दबा रखा है — क्या करूँ?

लिखित में तय समय माँगें और हर बातचीत का रिकॉर्ड रखें। बिना वाजिब कारण इतनी देरी सेवा में कमी है — 1915 हेल्पलाइन या ई-दाखिल पोर्टल से शिकायत करें।

सवाल 2: कंपनी कह रही है “पानी लग गया”, लेकिन मैंने संभालकर रखा था?

यह साबित करना कंपनी की ज़िम्मेदारी है। जाँच रिपोर्ट लिखित में माँगें — कोरी बात पर दावा न छोड़ें।

सवाल 3: ऑनलाइन खरीदा मोबाइल खराब हो गया — दावा कहाँ करूँ?

निर्माता कंपनी के सेवा केंद्र में — वारंटी हर जगह लागू होती है। ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म पर उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020 भी लागू होते हैं।

सवाल 4: वारंटी खत्म होने के दस दिन बाद सामान खराब हुआ — कोई रास्ता?

कठिन, पर नामुमकिन नहीं। अगर खराबी वारंटी अवधि में ही शुरू हुई थी और आपने शिकायत की थी, तो रिकॉर्ड के आधार पर दावा बन सकता है। इसलिए खराबी दिखते ही लिखित शिकायत करें।

सवाल 5: क्या सच में बिना वकील के उपभोक्ता आयोग में केस लड़ा जा सकता है?

हाँ। पाँच लाख तक के दावे पर कोई शुल्क भी नहीं। ई-दाखिल पोर्टल पर प्रक्रिया ऑनलाइन है। बड़े या पेचीदा मामलों में वकील की सलाह लेना समझदारी है।

सवाल 6: क्षतिपूर्ति में असल में कितना मिलता है?

हर मामले के तथ्यों पर निर्भर — सामान की कीमत, परेशानी की अवधि और आपके सबूत। आयोग मरम्मत/बदलाव/धनवापसी के साथ मानसिक कष्ट और मुक़दमे के खर्च का भी आदेश दे सकता है।

अंत में — डरिए मत, कागज़ संभालिए

रमेश की कहानी का अंत अच्छा भी हो सकता था — अगर पहले ही दिन लिखित शिकायत की होती और हर रसीद संभाली होती। वारंटी का मतलब यही है — कंपनी का वादा, और वादा टूटने पर आपका हक़।

अगली बार सामान खरीदें तो बिल और वारंटी कार्ड की तस्वीर फ़ोन में रखें। खराबी दिखे तो पहले ही दिन लिखित में बताएँ — और टालमटोल हो तो याद रखें, 1915 हेल्पलाइन और ई-दाखिल पोर्टल आपके लिए ही बने हैं।

नोट: यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी है, व्यक्तिगत कानूनी सलाह नहीं। हर मामला अपने तथ्यों पर निर्भर करता है — बड़ा फ़ैसला लेने से पहले अनुभवी वकील से सलाह ज़रूर लें।

Rohit Suhan
आसान भाषा में कानूनी जानकारी — हर भारतीय के लिए।

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