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खर्चा-पानी का अधिकार कैसे मिलेगा 2026

📅 2 October 2026 • ⏱️ 8 मिनट में पढ़ें • ✍️ Rohit Suhan

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परिवार / विवाह — कानूनी जानकारी

1खर्चा-पानी यानी क्या — एक सीधी बात

खर्चा-पानी यानी अदालत का वो आदेश, जिसके तहत कमाने वाला व्यक्ति अपने आश्रित परिवार के सदस्य को हर महीने तय रकम देता है — ताकि वो भूखा न रहे, बच्चे पढ़ सकें। कानून की नज़र में ये एहसान नहीं, अधिकार है। बीएनएसएस की धारा 144 (1 जुलाई 2024 से) सभी धर्मों पर एक जैसी लागू होती है।

⚖️ पुराना नाम, नया कानून: पहले इसे सीआरपीसी की धारा 125 से जाना जाता था। 1 जुलाई 2024 से यही अधिकार बीएनएसएस की धारा 144 में है। पुराने कागज़ों पर “125 सीआरपीसी” लिखा दिखे तो घबराइए नहीं — मतलब वही है।

2किन-किन कानूनों से खर्चा-पानी मिल सकता है

लोगों को लगता है कि खर्चा-पानी का एक ही कानून है। हकीकत ये है कि हालात के हिसाब से पांच अलग रास्ते हैं:

कानूनकिस काम का है
बीएनएसएस धारा 144 (सभी धर्मों के लिए)पत्नी, बच्चे और माता-पिता — सबसे तेज़ और सबसे आम रास्ता। मजिस्ट्रेट के पास सीधा आवेदन।
हिंदू विवाह अधिनियम — धारा 24 और 25हिंदू दंपति के लिए। धारा 24 — केस चलते खर्चा; धारा 25 — तलाक के बाद स्थायी खर्चा।
हिंदू भरण-पोषण अधिनियम, 1956धारा 18 — पत्नी का अधिकार; धारा 19 — विधवा बहू का ससुराल से; धारा 20 — बच्चों और बूढ़े माता-पिता का।
घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 — धारा 20मारपीट या मानसिक प्रताड़ना के साथ धन राहत — घर का खर्च, बच्चों की फीस, इलाज का पैसा।
मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986तलाकशुदा मुस्लिम महिला के लिए खास प्रावधान — इद्दत की अवधि और उसके बाद के अधिकार।

याद रखिए — ये रास्ते एक-दूसरे के दुश्मन नहीं। हालात के मुताबिक एक से ज़्यादा रास्ते एक साथ भी अपनाए जा सकते हैं। आपके लिए कौन-सा सबसे मज़बूत है, ये जानने के लिए अनुभवी वकील से सलाह ज़रूर लें।

3कौन-कौन खर्चा-पानी मांग सकता है — 4 हकदार

👩 पत्नी

जो पत्नी अपना गुजारा खुद नहीं कर सकती — तलाकशुदा पत्नी भी, अगर उसने दूसरी शादी न की हो। जो पत्नी बिना वजह पति को छोड़कर चली गई हो, उसे ये अधिकार नहीं मिलता।

🧒 बच्चे

नाबालिग बच्चे — जायज़ हों या नाजायज़। नया कानून एक कदम आगे है: वयस्क बच्चा भी मांग सकता है, अगर शारीरिक या मानसिक कमी की वजह से खुद कमा नहीं सकता।

👴 माता-पिता

ये वो अधिकार है जो बहुत कम लोग जानते हैं। बूढ़े मां-बाप अपने बच्चों से खर्चा-पानी मांग सकते हैं — अगर बच्चे कमाने लायक हैं और मां-बाप अपना गुजारा नहीं कर सकते। बेटा हो या बेटी, दोनों पर ये ज़िम्मेदारी आती है।

🙋 विधवा बहू

पति के न रहने पर विधवा बहू ससुराल की संपत्ति से खर्चा-पानी मांग सकती है — अगर उसके पास खुद की आय न हो और वो दूसरी शादी न करे।

4गूगल पर सबसे ज़्यादा पूछे जाने वाले 5 भ्रम

❓ “क्या खर्चा-पानी के लिए तलाक ज़रूरी है?”

नहीं। बीएनएसएस धारा 144 में तलाक की कोई शर्त नहीं है। शादीशुदा रहते हुए भी आवेदन हो सकता है — अगर पति खर्चा नहीं दे रहा। तलाक अलग मुकदमा है, खर्चा-पानी अलग अधिकार।

❓ “पत्नी खुद कमाती है, तो भी मिलेगा?”

अगर पत्नी की आय से गुजारा आराम से हो जाता है, तो अदालत इनकार कर सकती है। लेकिन आय पति के रहन-सहन से बहुत कम हो, तो अंतर की रकम मिल सकती है।

❓ “पति की आय का सबूत मेरे पास नहीं, तो क्या होगा?”

2020 के राजनेश बनाम नेहा फैसले के बाद दोनों पक्षों को आय-संपत्ति का शपथ-पत्र देना ही होगा। पति आय छिपाएगा तो अदालत रहन-सहन और संपत्ति देखकर अंदाज़ा लगाएगी।

❓ “कितने साल तक मिलेगा?”

जब तक हालात न बदलें। पत्नी की दूसरी शादी, पत्नी की अपनी पर्याप्त आय, या बच्चे के कमाने लायक बनने पर अदालत आदेश बदल या खत्म कर सकती है। रकम बढ़ाने या घटाने का आवेदन भी हो सकता है।

❓ “क्या मां-बाप सच में बच्चों से मांग सकते हैं?”

हां, बिल्कुल। बूढ़े, बीमार या बेसहारा मां-बाप अपने कमाऊ बच्चों से खर्चा-पानी का दावा कर सकते हैं।

5आवेदन की प्रक्रिया — 6 कदम

कागज़-कलम उठाइए — कदम छोटे हैं:

1

कागज़ जुटाइए

शादी का प्रमाण (विवाह प्रमाण-पत्र या फोटो/गवाह), बच्चों के जन्म प्रमाण-पत्र, पता प्रमाण, और पति की आय का जो भी सबूत हाथ लगे — वेतन पर्ची, बैंक जानकारी, दुकान/ज़मीन का ब्योरा।

2

अपनी आय-व्यय का शपथ-पत्र बनवाइए

राजनेश बनाम नेहा नियम के तहत आपको अपनी आय, खर्च, संपत्ति और देनदारी का सत्यापित ब्योरा देना होगा — झूठ बिल्कुल न लिखें।

3

आवेदन दाखिल कीजिए

आवेदन न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास या पारिवारिक न्यायालय में दाखिल होता है — वहां, जहां आप रहती हैं, जहां पति रहता है, या जहां दोनों आखिरी बार साथ रहे थे।

4

अंतरिम राहत मांगिए — फैसले का इंतज़ार न कीजिए

आवेदन के साथ ही अंतरिम खर्चा-पानी की अलग अर्ज़ी लगाइए — केस चलते हुए भी हर महीने कुछ रकम मिलती रहे। अंतरिम अर्ज़ी का निपटारा जहां तक संभव हो 60 दिन में हो।

5

सुनवाई में दोनों पक्षों की बात

अदालत पति को सूचना भेजेगी और उससे भी आय-व्यय का शपथ-पत्र लेगी। दोनों की दलीलें सुनी जाएंगी। अगर पति जानबूझकर शपथ-पत्र न दे या तारीख पर तारीख ले, तो अदालत उसका पक्ष खारिज करके भी फैसला कर सकती है।

6

आदेश — और न देने पर सज़ा

अदालत मासिक रकम तय करके आदेश देगी — और ये रकम आवेदन की तारीख से मिलनी शुरू होती है, फैसले की तारीख से नहीं। आदेश के बाद भी पैसा न दे तो बकाया वसूली के लिए वारंट और कैद तक का प्रावधान है।

💡 पैसे नहीं हैं वकील के लिए? हर जिले के ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण से ज़रूरतमंद महिला, बच्चों और बुज़ुर्गों को मुफ़्त कानूनी मदद मिलती है। अपने ज़िले के न्यायालय परिसर में इसका कार्यालय पूछिए।

6कितना खर्चा-पानी मिलेगा — रकम कैसे तय होती है

सबसे ईमानदार जवाब ये है कि कानून में कोई तय रकम नहीं है। कोई भी आंकड़ा जो कोई “गारंटी” के साथ बताए, वो गलत है। अदालत हर मामले को अलग देखती है। रकम तय करते वक्त अदालत इन बातों को तौलती है:

  • पति की असली आय — वेतन, खेती, दुकान, किराया, ब्याज — सब कुछ। कमाने की क्षमता भी देखी जाती है।
  • शादी के दौरान का रहन-सहन — पत्नी को उसी स्तर की ज़िंदगी का हक़ है, जिस स्तर पर वो शादी में रहती थी।
  • पत्नी की अपनी आय और ज़रूरतें — बच्चों की पढ़ाई, इलाज, घर का किराया — हर खर्च का हिसाब।
  • दोनों की उम्र, सेहत और देनदारी — बूढ़े मां-बाप की देखभाल, कर्ज़ की किश्त जैसे बोझ भी गिने जाते हैं।

अदालतों के फैसलों से एक मोटी दिशा ज़रूर मिलती है — रकम अक्सर पति की आय के एक-चौथाई से एक-तिहाई के बीच तय होती है। ये कोई कानून नहीं, फैसलों से बनी आम चलन है। आपके मामले में इससे कम या ज़्यादा भी हो सकता है।

⚠️ आय छिपाने की चाल अब नहीं चलेगी: राजनेश बनाम नेहा (सुप्रीम कोर्ट, 4 नवंबर 2020) के बाद दोनों पक्षों को आय-संपत्ति का पूरा ब्योरा शपथ-पत्र में देना अनिवार्य है। झूठे ब्योरे पर अदालत सख़्त रुख अपना सकती है।

77 गलतियां जो आपका दावा कमज़ोर कर सकती हैं

❌ गलती✅ सही तरीका
सालों तक चुप रहना, “शायद सुधर जाए” सोचकर देर करनाजल्दी आवेदन करें — रकम आवेदन की तारीख से मिलती है, जितनी देर उतना नुकसान।
शपथ-पत्र में आय-खर्च बढ़ा-चढ़ाकर लिखनाबिल्कुल सच लिखें। एक झूठ पकड़ा गया तो पूरे केस पर शक हो जाता है।
अंतरिम राहत की अर्ज़ी न लगानाआवेदन के साथ ही अंतरिम खर्चे की अर्ज़ी लगाएं — केस चलते भी पैसा मिलेगा।
पति की आय के सबूत इकट्ठा न करनावेतन पर्ची, बैंक जानकारी, संपत्ति का ब्योरा — जो मिले संभालकर रखें।
तारीख पर अदालत न जानाहर तारीख पर हाज़िर रहें। बार-बार गैरहाज़िरी से आवेदन खारिज हो सकता है।
आदेश के बाद पैसा न मिलने पर चुप रहनावसूली की अर्ज़ी लगाइए — बकाया के लिए वारंट और कैद तक का प्रावधान है।
“मुझे कुछ नहीं मिलेगा” सोचकर कोशिश ही न करनाये अधिकार इसीलिए बना है कि कोई बेसहारा न रहे। मुफ़्त कानूनी मदद भी उपलब्ध है।

8अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल 1: आवेदन कहां दाखिल करें — अपने शहर में या पति के शहर में?

तीनों जगह का विकल्प है — जहां आप रहती हैं, जहां पति रहता है, या जहां दोनों आखिरी बार साथ रहे थे। आमतौर पर अपने शहर में करना सबसे आसान रहता है।

सवाल 2: केस में कितना समय लगेगा?

नियम कहता है कि कार्यवाही जल्द से जल्द निपटे — अंतरिम अर्ज़ी जहां तक संभव हो 60 दिन में। इसीलिए अंतरिम राहत की अर्ज़ी ज़रूर लगाएं।

सवाल 3: क्या एक से ज़्यादा कानूनों में एक साथ आवेदन कर सकते हैं?

हां। लेकिन एक ही खर्च के लिए दो जगह से दोगुनी रकम नहीं मिलेगी; अदालतें आपस में तालमेल बैठाती हैं।

सवाल 4: पति बेरोज़गार है, तो क्या मिलेगा?

अदालत कमाने की क्षमता देखती है, सिर्फ मौजूदा नौकरी नहीं। स्वस्थ, काम करने लायक व्यक्ति “मेरे पास कुछ नहीं” कहकर ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता।

सवाल 5: बाद में रकम बढ़ाई या घटाई जा सकती है?

हां। हालात बदलने पर — आय बढ़े या घटे, बच्चों की ज़रूरतें बदलें — दोनों में से कोई भी पक्ष बदलाव की अर्ज़ी लगा सकता है।

सवाल 6: क्या खर्चा-पानी सिर्फ पत्नी का हक़ है?

नहीं। बच्चे और बूढ़े मां-बाप भी उतने ही हक़दार हैं — धारा 144 का नाम ही है “पत्नियों, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण का आदेश”।

📝 ज़रूरी नोट: ये लेख आम कानूनी जानकारी के लिए है, निजी सलाह नहीं। हर परिवार के हालात अलग होते हैं — बड़ा फैसला लेने से पहले अनुभवी वकील से सलाह ज़रूर लें। कानून समय-समय पर बदलते रहते हैं, ताज़ा जानकारी न्यायालय या विधिक सेवा प्राधिकरण से जांच लें।

Rohit Suhan
आसान भाषा में कानूनी जानकारी — हर भारतीय के लिए।

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